विश्वामित्र ने ऋषि, महर्षि और उसके बाद राजर्षि तक की उपाधि पा ली थी मगर कोई उन्हें ब्रह्मर्षि का दर्जा नहीं दे रहा था। जब भी कहीं ऐसी कोई चर्चा चलती, उन्हें यही सुनने को मिलता कि ब्रह्मर्षि तो वशिष्ठ हैं। उन्होंने और कठिन तपस्या शुरू की। कहते हैं कि उनके तप के प्रभाव से दिग-दिगंत कांप उठे, पर लंबी तपस्या का भी वैसा कोई फल नहीं मिला जैसा विश्वामित्र चाहते थे। आखिर उनका धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने तपस्या छोड़ी और चल पड़े वशिष्ठ के आश्रम की ओर कि आज नहीं छोड़ूंगा उसे।
उन्हें लग रहा था कि जरूर वशिष्ठ की इसमें कोई चाल है, वर्ना ऐसा क्या कि उनके अलावा दूसरा कोई ब्रह्मर्षि न बन सके।
यही सब सोचते हुए विश्वामित्र वशिष्ठ के आश्रम तक पहुंच गए। उन्होंने देखा कि चांदनी रात में वशिष्ठ बैठे अपने शिष्यों के साथ बातचीत कर रहे हैं। वहीं पास की झाड़ी में छिप कर वह गुरु और शिष्यों के बीच की बातचीत सुनने लगे। शिष्य ने वशिष्ठ से पूछा, ‘‘गुरुवर स्वच्छ आकाश में प्रकाश फैला रहे इस शीतल चांद को देख कर आपके मन में कौन से भाव आ रहे हैं।’’
वशिष्ठ बोले, ‘‘चांद की चांदनी वैसे ही पूरे संसार को प्रकाशित कर रही है जैसे ऋषि विश्वामित्र का यश।’’ विश्वामित्र चकित रह गए। कहां तो मैं इन्हें मारने चला था और कहां यह मेरी प्रशंसा कर रहे हैं। वह सामने आए और सीधे वशिष्ठ के चरणों पर गिर पड़े, ‘‘क्षमा ऋषि प्रवर, क्षमा।’’
वशिष्ठ ने उन्हें उठाते हुए कहा, ‘‘उठो ब्रह्मर्षि।’’ इस बार विश्वामित्र समेत समस्त शिष्टमंडली चौंक पड़ी, पर वशिष्ठ मुस्कुराते खड़े थे। उन्होंने कहा, ‘‘विश्वामित्र हर तरह से योग्य थे, बस उनका अहं और इस पद की लालसा उनके मार्ग की बाधा थी। जैसे ही वह पश्चाताप के आंसुओं के साथ झुके, दोनों बाधाएं तत्क्षण दूर हो गईं और वह पद उन्हें मिल गया जिसके वह अधिकारी थे।’’
मध्य प्रदेश हमेशा से संस्कृति और स्थापत्य कलाओं को लेकर दुनियाभर में फेमस है। इसकी पहाडिय़ों और कंदराओं में ढेरों अनसुलझे रहस्य भी दबे पड़े हैं, जिनको ना तो सुलझाया जा सका और ना ही कोई हल ही निकल पाया है।
ऐसे ही एक अनसुलझे सवालों के लिए भोपाल से करीब 180 किमी दूर स्थित देवास का कावडिय़ा पहाड़ आज भी चर्चा और आश्चर्य का विषय बना हुआ है। लंबे और षठकोणीय पत्थरों से बने पहाड़़ को लेकर यह चर्चा है कि यह मानव निर्मित है या प्रकृति ने इसे नायाब रूप दिया है।
बीयू से पीएचडी कर चुके डॉ रत्नेश का कहना है कि मैं रिसर्च के लिए देवास और आस-पास के इलाकों में लंबे समय तक रहा हूं। इस पहाड़ के बारे में एक दंतकथा प्रचलित है कि, एक बार मां नर्मदा और भीम के बीच संवाद हुआ, जिसमें मां नर्मदा ने शर्त रखी कि अगर तुम एक रात में बांध बनाकर मेरे पानी को रोक दोगे तो मैं तुमसे शादी कर लूंगी।
मां नर्मदा की शर्त मानते हुए भीम ने पत्थरों का पहाड़ तो बना दिया लेकिन मां नर्मदा के पानी को रोक नहीं पाए। तब से यह पहाड़ एक बांध के रूप में स्थापित हो गया।
कावडिय़ा पहाड़ पर लंबे समय से रिसर्च कर रहे इतिहासविद डॉ तेज सिंह सेंधव के अनुसार यह पहाड़ महाभारत काल में बना हुआ है। उन्होंने अपनी पुस्तक युग-युगीन देवास में इसके भीम द्वारा निर्मित होने के साक्ष्य भी दिए हैं।
इतिहास के संरक्षण के लिए काम कर रही है एक संस्था अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नई दिल्ली ने भी सेंधव के इस तथ्य को सही ठहराया है। वहीं आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया एएसआई इसे वातावरण में आए बदलाव का रूप मानते हैं।
डॉ सिंह का कहना है कि मैं इस पहाड़ पर लंबे समय से रिसर्च कर रहा हूं। साथ ही देश भर के कई रिसर्च स्कॉलर भी इस पर शोध कर रहे हैं, जो इन दिनों भोपाल में हैं। हमने इस पहाड़ को लेकर कार्बन डेटिंग कराई है।
इसका समय महाभारत काल से जुड़ा है। इसलिए यह उसी काल की निर्मित पहाड़ी है। देवास और आस-पास के इलाकों में पांडवों के आने के भी साक्ष्य मिलते हैं। जो इस बात को और भी पुष्ट करते हैं कि पहाड़ महाभारत काल में निर्मित है।
सीनियर आर्कियोलॉजिस्ट पूजा सक्सेना कहती हैं, यह कयास गलत है कि इसका निर्माण भीम ने किया है। बल्कि ऐसे पहाड़ों का निर्माण ज्वालामुखी के फटने और लंबे समय बाद ठंडा होने के परिणामस्वरूप बनता है। दुनिया में ऐसे कई द्वीप हैं, जहां ऐसे पहाड़ बडी संख्या में देखने को मिलते हैं।
बहाई धर्म उन्नीसवीं सदी के ईरान में सन 1844 में स्थापित एक नया धर्म था, जो एकेश्वरवाद और विश्वभर के विभिन्न धर्मों और पंथों की एकमात्र आधारशिला पर जोर देता है. इस धर्म की स्थापना बहाउल्लाह ने की थी और इसके मतों के मुताबिक दुनिया के सभी मानव धर्मों का एक ही मूल है.
इसके अनुसार कई लोगों ने ईश्वर का संदेश इंसानों तक पहुंचाने के लिए नए धर्मों का प्रतिपादन किया जो उस समय और परिवेश के लिए उपयुक्त है।
तो आइए जानते हैं बहाई धर्म के बारे में 8 रोचक तथ्य…
1. बहाई धर्म के अनुयायी बहाउल्लाह को पूर्व के अवतारों कृष्ण, ईसा मसीह, मुहम्मद, बुद्ध, जरथुस्त्र, मूसा आदि का पुर्नजन्म माना जाता है. इस धर्म के लोग बहाउल्लाह को कल्कि अवतार के रूप में भी मानते हैं.
2. बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह का जन्म आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व तेहरान (ईरान) में हुआ था. बहाउल्लाह का शाब्दिक अर्थ है – ‘ईश्वरीय प्रकाश’ या ‘परमात्मा का प्रताप’.
Image: Bahai Rants
3. बहाउल्लाह को प्रभु का कार्य करने के कारण तत्कालिक शासक के आदेश से 40 वर्षों तक जेल में असहनीय कष्ट सहने पड़े. जेल में उनके गले में लोहे की मोटी जंजीर डाली गई तथा उन्हें कई तरह की कठोर यातनायें दी गई.
भारत में बहाई धर्म कैसे आया ?
4. भारत में बहाई धर्म से इसके स्थापना वर्ष 1844 से ही जुड़ा हुआ है. असल में जिन 18 पवित्र आत्माओं ने ‘महात्मा बाब’, ‘भगवान बहाउल्लाह’ के अग्रदूत को पहचाना और स्वीकार किया था, उन में से एक व्यक्ति भारत के रहने वाले थे और इस तरह से ये धर्म भारत आया.
5. ‘बहाउल्लाह’ ने लोगों को यह संदेश दिया कि सम्पूर्ण मानव एक जाति है और वह समय आ गया है, जब वह एक वैश्विक समाज में बदल जाये.
6. बहाउल्लाह द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘किताब-ए-अकदस’ में इसके सिद्धांतों का विवरण मिलता है. यह किताब 1873 के आसपास लिखी गई थी. इस किताब को इसके फारसी नाम ‘किताब-ए-अकदस’ से अधिक जाना जाता है.
7. बहाई धर्म के अनुयायी पूरी दुनिया के लगभग 180 देशों में समाज-नवनिर्माण के कामों में लगे हुए हैं. बहाई धर्म में धर्म गुरु, पुजारी, मौलवी या पादरी वर्ग नहीं होता है.
8. ‘बहाई उपासना मन्दिर’ जोकि ‘लोटस टेम्पल’ के नाम से जाना जाता है, कालका जी, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली में स्थित है. बहाई धर्म के पूरी दुनिया में कुल 7 देशों में मन्दिर बनाये गये हैं जो कि वेस्टर्न समोआ, सिडनी – औस्ट्रेलिया, कम्पाला- युगान्डा, पनामा सिटी – पनामा, फ्रेन्क्फर्ट्- जर्मनी और विलमेट, अमेरिका और नई दिल्ली, भारत में मौजूद हैं.
हमारे धर्मशास्त्रों में भगवान कल्कि की दसवें अवतार के रूप में चर्चा है। कहा गया है कि ज्यों-ज्यों घोर कलियुग आता जाएगा, त्यों-त्यों दिनों-दिन धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु और बल का लोप होता जाएगा। कलियुग में जिसके पास धन होगा उसी को लोग कुलीन, सदाचारी और सद्गुणी मानेंगे जो जितना छल, कपट कर सकेगा वह उतना ही व्यवहार-कुशल माना जाएगा। धर्म का सेवन यश के लिए किया जाएगा।
शास्त्र कहते हैं- कलियुग के अंतिम दिनों में शम्भल ग्राम में विष्णु यश नाम के एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होंगे। उनका हृदय बड़ा उदार होगा। वह भगवान के परम भक्त होंगे। उन्हीं के घर कल्कि भगवान अवतार ग्रहण करेंगे। वह देव दत्त नामक घोड़े पर सवार होकर दुष्टों को तलवार के घाट उतारेंगे तथा पृथ्वी पर विलुप्त धर्म की पुन: स्थापना करेंगे।
भगवान के जन्म का चंद्रमा धनिष्ठा नक्षत्र और कुंभ राशि में होगा। सूर्य तुला राशि में स्वाति नक्षत्र में गोचर करेगा। गुरु स्वराशि धनु में और शनि अपनी उच्च राशि तुला में विराजमान होगा। वह ब्राह्मण कुमार बहुत ही बलवान, बुद्धिमान और पराक्रमी होगा। मन में सोचते ही उनके पास वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जाएंगे। वह सब दुष्टों का नाश करेंगे तब सतयुग शुरू होगा। वह धर्म के अनुसार विजय पाकर चक्रवर्ती राजा बनेंगे। वह अपने माता-पिता की पांचवीं संतान होंगे। भगवान कल्कि के पिता का नाम विष्णु यश और माता का नाम सुमति होगा।
पिता विष्णु यश का अर्थ हुआ, ऐसा व्यक्ति जो सर्वव्यापक परमात्मा की स्तुति करता लोकहितैषी है। सुमति का अर्थ है अच्छे विचार रखने और वेद, पुराण तथा विद्याओं को जानने वाली महिला। कल्कि निष्कलंक अवतार हैं। भगवान का स्वरूप (सगुण रूप) परम दिव्य है। दिव्य अर्थात दैवीय गुणों से सम्पन्न। वह सफेद घोड़े पर सवार हैं।
भगवान का रंग गोरा है लेकिन गुस्से में काला भी हो जाता है। प्रभु के हृदय पर श्रीवत्स का चिन्ह अंकित है। गले में कौस्तुभ मणि है। युद्ध के समय उनके हाथों में दो तलवारें होती हैं। कल्कि को विष्णु का भावी और अंतिम अवतार माना गया है। पृथ्वी पर पाप की सीमा पार होने लगेगी तब दुष्टों के संहार के लिए विष्णु का यह अवतार प्रकट होगा। भगवान का यह अवतार दिशा धारा में बदलाव का बहुत बड़ा प्रतीक होगा।
भगवान जब कल्कि के रूप में अवतार ग्रहण करेंगे उसी समय सतयुग का प्रारंभ हो जाएगा। प्रजा सुख-चैन से रहने लगेगी।
रामायाण को हिन्दूओं का पवित्र ग्रन्थ माना जाता हैं। जनमानस जानता है कि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी। लेकिन बहुत ही कम लोगों को यह पता है कि महर्षि वाल्मीकि से पूर्व ही किसी और न भी रामायण को लिपिबद्ध कर दिया था। वह और कोई नहीं भगवान राम के परम भक्त हनुमान हैं।
जब भगवान राम रावण को मार कर अयोध्या पहुंचे तो हनुमान भगवान शिव के पास चले गए। वहां पर उन्होंने अपने नाखूनों की सहायता से रामायण को लिपिबद्ध किया। जब महर्षि वाल्मीकि ने अपनी रचना लिपिबद्ध करने बाद शिव के पास उनको अपने कृति भेंट करने आए। तो उन्होंने देखा कि वहां पत्थरों पर कथा लिखी हुई हैं। यह देखकर वह निराश हुए और वह वापस जाने लगे।
जब इस बात का पता हनुमान जी को चला तो वो महर्षि के पास आए। एक हाथ में हस्तलिखित पत्थर और दूसरे हाथ में महर्षि को लेकर समुद्र किनारे गए। वहां जाकर उन्होंने अपने रामायण को समुद्र में फेक दिया। इस प्रकार हनुमान जी द्वारा लिखित राम कथा का कोई अस्तित्व नहीं रहा।
महाभारत के अनुसार जब द्रोणाचार्य ने अपने शिष्य अर्जुन के दु्रपद को बंदी बनाकर अपने सामने लाने को कहा। तो अर्जुन ने गुरु की आज्ञा मानकर दुु्रपद को उनके सामने प्रस्तुत किया। गुरु द्रोणाचार्य ने अपने अपमान का बदला लेते हुए द्रुपद को आधा राज्य देकर मुक्त कर दिया।
अपने अपमान और पराजय से महाराज द्रुपद काफी दुखी हुए और द्रोणाचार्य को नीचा दिखाने के लिए उपाय खोजने लगे। ऐसी ही काफी समय व्यतीत हो गया। एक बार वह कल्याणी नगर में स्थित ब्राह्मणों की बस्ती में पहुंचे। जहां उनकी मुलाकात दो ब्राह्मण भाइयों से हुई। राजा द्रुपद ने उनकी काफी सेवा की और गुरु द्रोणाचार्य की मौत का उपाय पूछा।
ब्राह्मण भाईयों ने उनको यज्ञ एक विशाल यज्ञ कर अग्निदेव को खुश करने को कहा। तब महाराज दु्रपद ने उनसे ही यह यज्ञ करने को कहा। वो दोनों भाई इसके लिए तैयार हो गए। यज्ञ सम्पन्न होने पर हवन कुण्ड से एक बालक की उत्पत्ति हुई। जो सम्पूर्ण अस्त्र और शस्त्र से सुज्जित था। जिसका नाम धृष्टद्युम्न रखा गया जो आगे चलकर गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु की वजह बना।
महाभारत एक ऐसी कथा है जिसके साथ में कई रोचक किस्से जुड़े हुए हैं। ऐसा ही एक कथा है जब युधिष्ठिन ने अश्वमेघ यज्ञ करने का प्रण किया तो अर्जुन ने समस्त पृथ्वी पर युधिष्ठिर का एक छत्र राज स्थापित कर दिया। यह देखकर युधिष्ठिर के साथ वहां उपस्थित सभी लोग काफी उत्साहित व हर्षित हुए।
फिर भगवान कृष्ण की निगरानी में यज्ञ के लिए भूमि का चयन किया गया। शुभ दिन और शुभ मुहूर्त पर यज्ञ प्रारम्भ हुआ। यज्ञ में शामिल होने के लिए दूर-दूर से राजा-महाराजाओं को आमंत्रित किया गया और सभी इस वैभवशाली यज्ञ को देखने के लिए वहां उपस्थित हुए।
पाण्डवों ने यज्ञ में आए सभी अतिथियों का उचित आदर सत्कार किया। जब यज्ञ पूर्ण हुआ तो युधिष्ठिर ने सम्पूर्ण धरती ब्राह्मणों को दान में दे दी। लेकिन महर्षि वेदव्यास ने ब्राह्मणों का प्रतिनिधि बनकर वापस से सम्पूर्ण धरती युधिष्ठिर को वापस दे दी। इसके बदले उन्होंने ब्राह्मणों को सोना देने को कहा।
युधिष्ठिर ने वेदव्यास की बात मानते हुए ब्राह्मणों को सोना दान में दिया। जिसको पाकर ब्राह्मण काफी खुश हुए और उन्होंने युधिष्ठिर को आर्शीवाद दिए। इस प्रकार भगवान कृष्ण के निर्देशन में अश्वमेघ यज्ञ सकुशल संपन्न हुआ।