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मंगलवार, 19 सितंबर 2017

इंग्लैंड की क्रांति - Revolution of england 1688 in Hindi

By: Successlocator On: सितंबर 19, 2017
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  • जेम्स द्वितीय 1685 ई. में इंग्लैंड का राजा बना. उसे बहुत सुरक्षित सिंहासन प्राप्त हुआ था. परिस्थिति राजतंत्र के पक्ष में थी. विरोधी दल कुचला जा चूका था. राज्य के प्रति निर्विरोध आज्ञाकारिता का सिद्धांत स्वीकृत हो चूका था. संसद के अधिकांश सदस्य राजा के दैवी अधिकार सिद्धांत के समर्थक थे. जेम्स द्वितीय ने स्वयं ही परिस्थिति को विपरीत बना दिया और उसे अंततोगत्वा गद्दी छोड़कर भागना पड़ा. 1688 ई. में हुए इंग्लैंड की क्रांति को “गौरवपूर्ण क्रांति (Glorious Revolution)” भी कहा जाता है.

    इंग्लैंड की क्रांति संक्षेप में
    1688 ई. की क्रांति जेम्स द्वितीय के शासनकाल में हुई थी. क्रांति के लिए जेम्स द्वितीय ने खुद वातावरण तैयार किया था. उसके कार्यों से सभी दल के लोग असंतुष्ट थे. उन्हें विश्वास हो गया था कि राजा स्वेच्छाचारी शासन की पुनरावृत्ति करना चाहता है. जेम्स द्वितीय रोमन  कैथोलिक चर्च की शक्ति को बढ़ाना चाहता था. वह कैथलिकों को राज्य के महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करना चाहता था. वह किसी भी कानून को स्थगित अथवा रद्द करने के अधिकार द्वारा अपनी सत्ता को सर्वोपरि बनाना चाहता था. वह टेस्ट एक्ट को समाप्त करना चाहता था और इसलिए उसने न्यायालय में अपने समर्थक न्यायाधीशों को ही रहने दिया. वह स्थाई सेना की सहायता से विरोधियों पर नियंत्रण रखना चाहता था. इंग्लैंड की जनता जेम्स द्वितीय के क्रूर शासन को इसलिए बर्दास्त कर रही थी कि उसकी मृत्यु के बाद इंग्लैंड में कैथोलिक शासन का अंत होगा. लेकिन जून, 1688 ई में जेम्स द्वितीय की दूसरी कैथोलिक पत्नी से एक पुत्र उत्पन्न हुआ. पुत्र के जन्म ने इंग्लैंड की क्रांति को अवश्यम्भावी बना दिया. लोगों को विश्वास हो गया कि जेम्स द्वितीय की नीति अनंत काल तक चलती रहेगी. इस आशंका से लोग भयभीत हो गए. वे क्रांति द्वारा कैथोलिक शासन के अंत का प्रयास करने लगे. प्रतिकूल परिस्थिति के कारण जेम्स द्वितीय ने गद्दी छोड़ दिया. विलियम तृतीय और मेरी को इंग्लैंड का सम्राट और साम्राज्ञी घोषित किया गया. “अधिकारों का घोषणापत्र” तैयार किया गया. जेम्स द्वितीय के सभी कार्यों को अवैध घोषित किया गया. प्रजा तथा संसद के अधिकारों की पुष्टि की गई.

    1688 ई. की क्रांति के कारण
    1688 ई. के इंग्लैंड की क्रांति के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –

    जेम्स द्वितीय की धार्मिक नीति
    जेम्स द्वितीय कट्टर कैथोलिक था. कैथोलिक धर्म के सिधान्तों में उसकी गहरी आस्था थी. वह कैथोलिकों को राज्य के प्रमुख पदों पर नियुक्त करना चाहता था. इस पक्षपात को देखते हुए प्रोटेस्टेंट लोगों ने जेम्स के कार्यों का विरोध करना शुरू कर दिया. विरोधियों का दमन करने के लिए जेम्स द्वितीय ने अनेक कठोर कदम उठाये. हाई कमीशन नामक न्यायालय की स्थापना की गई. कैथोलिक धर्म की आलोचना अथवा निंदा करने का अधिकार किसी को नहीं था. विरोध की परवाह न करते हुए जेम्स द्वितीय ने कैथोलिक धर्म का प्रचार जारी रखा.

    फ्रांस के साथ मैत्री सम्बन्ध
    जेम्स द्वितीय का विश्वास था कि आवश्यकता पड़ने पर फ़्रांस का राजा लुई चौदहवाँ उसे सेना और धन से सहायता देगा. इस कारण उसने फ्रांस के साथ मैत्री सम्बन्ध बनाए रखना का पूर्ण रूप से प्रयास किया. उसने रोमन कैथोलिकों की सुविधाएँ प्रदान की और प्रोटेस्टेंट धर्म के अनुयायियों पर घोर अत्याचार किया. इंग्लैंड की प्रोटेस्टेंट जनता इस प्रकार के अत्याचार को सहन नहीं कर सकी. उसने जेम्स द्वितीय का विरोध करना शुरू कर दिया.

    टेस्ट एक्ट के प्रति उदासीनाता
    टेस्ट एक्ट के अनुसार केवल अंग्रेजी चर्च के अनुयायियों को ही राज्य कर्मचारी के रूप में नियुक्त किया जा सकता था. इस नियम के कारण कैथोलिकों की नियुक्ति नहीं की जा सकती थी. इसलिए जेम्स द्वितीय ने टेस्ट एक्ट को रद्द करने का प्रयास किया लेकिन संसद ने ऐसा करने की अनुमति नहीं दी. इससे असंतुष्ट होकर जेम्स द्वितीय ने संसद को ही स्थगित कर दिया.

    निलंबन और विमोचन के अधिकार का प्रयोग
    जेम्स द्वितीय का कहना था कि आवश्यकता होने पर राजा किसी भी नियम को स्थगित अथवा रद्द कर सकता है. इस अधिकार का प्रयोग करके उसने कैथोलिकों के विरुद्ध बने सभी कानूनों को रद्द कर दिया. इंग्लैंड की जनता ने राजा का विरोध किया.
    विश्वविद्यालय में हस्तक्षेप
    जेम्स द्वितीय ने विश्वविद्यालय के कार्यों में भी हस्तक्षेप किया. विश्वविद्यालय में बड़े-बड़े पदों पर कैथोलिकों की नियुक्ति की गई. कैंब्रिज विश्वविद्यालय के उप-कुलपति को पदच्युत कर दिया गया था क्योंकि उसने एक कैथोलिक को डिग्री देने से इनकार कर दिया था. ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में भी कैथोलिक धर्म का प्रचार की व्यवस्था की गई. क्रिस्ट चर्च के अध्यक्ष के पद पर एक कट्टर रोमन कैथोलिक को नियुक्त किया गया. विश्वविद्यालय के कार्यों में हस्तक्षेप से भी इंग्लैंड की जनता असंतुष्ट थी.

    धार्मिक न्यायालय की स्थापना
    1686 ई. में जेम्स द्वितीय ने धार्मिक न्यायालय की स्थापना की. इस न्यायालय का मुख्य उद्देश्य पादरियों को राजा की इच्छानुसार कार्य करने के लिए बाध्य करना था. धार्मिक न्यायालय द्वारा कैथोलिक धर्म के विरोधियों को क्रूर सजा दी जाती थी.

    स्थायी सेना में वृद्धि
    जेम्स द्वितीय को सुरक्षित सिंहासन प्राप्त हुआ था. उस समय न तो आंतरिक विरोध की संभावना थी और न विदेशी आक्रमण का भय था. फिर भी जेम्स द्वितीय स्थायी सेना में वृद्धि करना चाहता था. सैनिकों में अधिकांश कैथोलिक थे. इससे लोगों का आतंकित होना स्वाभाविक था. उन्हें विश्वास हो गया था कि जेम्स द्वितीय स्थायी सेना की सहायता से स्वेच्छाचारी शासन की स्थापना करेगा और कैथोलिक धर्म का प्रचार-प्रसार करेगा.

    स्कॉटलैंड और आयरलैंड के प्रति नीति
    `जेम्स द्वितीय के स्वेच्छाचारी शासन का प्रभाव स्कॉटलैंड और आयरलैंड पर भी पड़ा था. उसने वहाँ भी ऊँचे-ऊँचे पदों पर कैथोलिकों की नियुक्ति की. आयरलैंड के प्रोटोस्टेंट भयभीत हो गए. स्कॉटलैंड में रोमन कैथोलिकों को पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दी गई. इससे लोगों में असंतोष बढ़ा जिसके कारण आगे चलकर क्रांति संभव हो सकी.

    चुनाव में हस्तक्षेप
    जेम्स द्वितीय चुनाव में भी हस्तक्षेप करने लगा था. वह संसद के सदस्यों को नामजद (nominate) भी करने लगा था. वह अपने समर्थकों की संख्या संसद में बढ़ाना चाहता था. इससे संसद के सदस्य असंतुष्ट थे.

    सात पादरियों का मुकदमा
    जेम्स द्वितीय ने 1688 ई. में दूसरी घोषणा प्रकाशित की. उसने राज्य के प्रत्येक चर्च में इसे लगातार दो रविवारों को पढ़ने का आदेश दिया था. राजा की घोषणा की संसद की स्वीकृति प्राप्त नहीं थी. इसलिए राजा के आदेश को स्वीकार करना राजा की निरंकुशता को स्वीकार करना था. कैंटरबरी के आर्कविशप और छ: अन्य विशपों ने राजा के सामने एक आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर आदेश को वापस लेने की माँग  की. जेम्स द्वितीय ने इनपर राजद्रोह का अभियोग लगाकर मुकदमा चलवाया. लेकिन न्यायालय ने विशपों को निर्दोष घोषित किया. इससे लोगों ने आनंद और उत्साह की लहर दौड़ गई.

    पुत्र का जन्म
    जैसा हमने ऊपर भी लिखा है कि जेम्स द्वितीय ने अपनी कैथोलिक पत्नी से एक पुत्र को को जन्म दिया. इससे लोगों को लगने लगा कि यह कैथोलिक हमेशा उनपर भविष्य में भी हावी ही रहेंगे. उन्हें विश्वास हो गया कि बच्चे का लालन-पालन कैथोलिक वातावरण में होगा और उसे कैथोलिक शिक्षा दी जाएगी. इस प्रकार जेम्स द्वितीय की मृत्यु के बाद कैथोलिक शासन चलता रहेगा. इस आसह्नका से ही लोग भयभीत हो गए. अब वे क्रांति के द्वारा ही कैथोलिक शासन का अंत कर सकते थे.

    क्रांति के परिणाम
    राजा की शक्ति में कमी आई.
    संसद के अधिकारों में वृद्धि हुई.
    क्रांति के बाद अनेक अधिनियम बने.
    धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया गया.
    नौ-सेना, स्थल सेना आदि के व्यय के ब्योरे और ऋण का अनुमान लगाया.
    न्यायालय को स्वतंत्रता मिली.
    फ़्रांस को पराजित कर इंग्लैंड ने एक नयी यूरोपीय नीति अपनाई.
    स्कॉटलैंड को क्रांति से सांविधानिक और राजनीतिक लाभ प्राप्त हुए.
    क्रांति का आयरलैंड पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा. आयरलैंड का ऊन का व्यापार चौपट हो गया.
    1688 ई. की क्रांति इंग्लैंड के इतिहास में एक युगांतकारी घटना थी. निरंकुश राजतंत्र की परम्परा समाप्त हो गयी और राजा को वैधानिक सीमा में जकड़ दिया गया. 1689 ई . में अधिकार-विधेयक पारित हुआ. इसके अनुसार, राजा संसद की सहमति के बिना न तो किसी कानून को स्थगित कर सकता था, न किसी नए कानून को लागू कर सकता था, न नया कर लगा सकता था और न किसी व्यक्ति की सजा माफ़ कर सकता था. यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि कैथोलिक या कैथोलिक स्त्री से शादी करने वाला कोई भी व्यक्ति इंग्लैंड की गद्दी का अधिकारी नहीं होगा. निरंकुश राजतंत्र की जगह नियमानुमोदित शासन की स्थापना हुई. संसद की शक्ति बढ़ी. वह राजसत्ता पर नियंत्रण रखने लगी और राजकोष पर उसका एकमात्र अधिकार हो गया.

    संसद ने विद्रोही-कानून पास किया गया. इससे सेना पर संसद का नियंत्रण हो गया. त्रैवार्षिक कानून पास कर हर तीसरे वर्ष पर संसद का निर्वाचन अनिवार्य कर दिया गया. सहिष्णुता-कानून पास कर सभी प्रोटेस्टेंट सम्प्रदायों को धार्मिक स्वतंत्रता दी गयी. 1701 ई. में उत्तराधिकार निर्णायक कानून बना. इसके अनुसार ये तय हुआ कि इंग्लैंड का राजा प्रोटेस्टेंट ही होगा. कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका पर संसद का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया. अब राजा की जगह संसद संप्रभु हो गया. राजा की निरंकुशता समाप्त हो गई और संसद की संप्रुभता स्थापित हुई.

    मंगलवार, 12 सितंबर 2017

    प्रथम विश्वयुद्ध – First World War [1914-18]

    By: Successlocator On: सितंबर 12, 2017
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  • प्रथम विश्वयुद्ध की भूमिका (Background of First World War)
    1914-18 ई. का प्रथम विश्वयुद्ध (First World War) साम्राज्यवादी राष्ट्रों की पारस्परिक प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम था. प्रथम विश्वयुद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण गुप्त संधि प्रणाली थी. यूरोप में गुप्त संधि की प्रथा जर्मन चांसलर बिस्मार्क ने शुरू की थी. इसने यूरोप  को दो विरोधी गुटों में विभाजित कर दिया. दो गुटों के बीच एक-दूसरे के प्रति संदेह और घृणा का भाव बढ़ता गया. राजनीतिक वातावरण दूषित हो गया. 1879 ई. में जर्मनी ने ऑस्ट्रिया-हंगरी (Austria-Hungary) के साथ गुप्त संधि की. 1882 ई. में इटली भी इस गुट में शामिल हो गया. इस प्रकार त्रिगुट का निर्माण हुआ. 1887 ई. में जर्मनी और रूस दोनों मिल गए. विश्व राजनैतिक अखाड़े में फ्रांस अकेला पड़ गया. फ्रांस को अपमानित करने के लिए ही जर्मनी ने इन देशों के साथ संधि की थी. फ्रांस प्रतिशोध की आग में अन्दर ही अन्दर जल रहा था. इसलिए 1894 ई. में फ्रांस ने रूस से संधि की. उधर इंग्लैंड ने 1902 ई. में जापान के साथ, 1904 ई. में फ्रांस और 1907 ई. में रूस के साथ संधि कर ली.  इस प्रकार दो राजनीतिक खेमों में बँटा यूरोप युद्ध का अखाड़ा हो गया.

    एक ओर इंग्लैंड, फ्रांस, रूस और जापान का त्रिगुट था और दूसरा गुट जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी, इटली और तुर्की का था. दोनों के बीच हथियारबंदी की होड़ चल रही थी.
    1912-13 ई. के बाल्कन युद्धों (War in the Balkans) ने तो प्रथम विश्वयुद्ध को अनिवार्य बना दिया. यूरोप के अनेक राष्ट्र बाल्कन क्षेत्र में अपने साम्राज्य के विस्तार का प्रयास कर रहे थे. ऑस्ट्रिया और रूस भी इसी क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहते थे. बाल्कन क्षेत्र में साम्राज्यवादी प्रतिद्वंदिता ने विश्वयुद्ध की भूमिका तैयार की.

    गुप्त संधियों के अलावे प्रथम विश्व युद्ध के अनेक कारण गिनाये जा सकते हैं –

    Causes of World War I
    1. उग्र राष्ट्रीयता (Furious Nationality)
    उग्र राष्ट्रीयता के कारण भी प्रथम विश्वयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई थी. बड़े एवं शक्तिशाली राष्ट्रों के अतिरिक्त यूनान और सर्बिया जैसे छोटे-छोटे देशों पर भी उग्र राष्ट्रीयता का नशा चढ़ा हुआ था. वे वृहत्तर यूनान, वृहत्तर बुल्गेरिया और वृहत्तर सर्बिया की मांग कर रहे थे. चेक, स्लाव जातियाँ अपनी राष्ट्रीय आकांक्षा को पूरा करने के लिए यूरोप में अशांति उत्पन्न कर रही थीं. जब यूरोप के साम्राज्यवादी राष्ट्र अपनी सभ्यता-संस्कृति और धर्म का पाठ पढ़ाने के लिए संसार में आगे बढ़े तो उनमें संघर्ष अनिवार्य हो गया.

    2. आर्थिक प्रतिद्वंदिता (Economic Rivalry)
    औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप यूरोप के राष्ट्रों के आर्थिक जीवन में महान् परिवर्तन हुआ. पूंजीवाद की उत्पत्ति हुई. पूँजीवादी अतिरिक्त पूँजी लगाने के लिए उपनिवेश की माँग करने लगे. बढ़ती हुई जनसंख्या को बसाने के लिए भी उपनिवेश की आवाश्यकता थी. इस समस्या का समाधान साम्राज्य-विस्तार से ही संभव था. इसलिए उपनिवेश को लेकर ही संघर्ष प्रारम्भ हुआ. पूँजीवादी राष्ट्रों के बीच आर्थिक महत्त्वाकांक्षा के कारण घृणा और अविश्वास का वातावरण तैयार हो गया.

    3. साम्राज्यवादी होड़ (Imperialist Competition)
    साम्राज्यवादी होड़ प्रथम विश्वयुद्ध का एक आधारभूत कारण था. औद्योगिक क्रान्ति के कारण यूरोपीय देशों के सामने व्यावसायिक माल की खपत और कल-कारखानों को चलाने के लिए कच्चे माल की प्राप्ति की समस्या उत्पन्न हुई. इस समस्या का समाधान साम्राज्य-विस्तार में दिखाई दिया. इसलिए इंग्लैंड, फ्रांस, हॉलैंड, बेल्जियम, पुर्तगाल, डेनमार्क, इटली अपना साम्राज्य बढ़ाने का प्रयत्न करने लगे. इससे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विता बढ़ी. अफ्रीका और चीन इस प्रतिद्वंद्विता का शिकार पहले हुए. सूडान को लेकर इंग्लैंड और फ्रांस के बीच युद्ध छिड़ते-छिड़ते बचा.

    4. सैन्यवाद और शस्त्रीकरण (Militarism and Armament)
    उग्र राष्ट्रीयता और साम्राज्यवादी मनोवृत्ति ने यूरोप के राष्ट्रों का ध्यान सैन्यवाद और शस्त्रीकरण की ओर खींचा. फ्रांस, जर्मनी आदि साम्राज्यवादी राष्ट्र अपनी आमदनी का 85% सैनिक तैयारी पर खर्च करने लगे. भय तथा संदेह ने प्रत्येक राष्ट्र को युद्ध-सामग्री जमा करने के लिए उत्प्रेरित किया और इस तरह प्रत्येक देश युद्ध के लिए तैयार हो गया.

    5. समाचारपत्रों का झूठा प्रचार (Newspapers’ False Propaganda)
    प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व सभी देशों के समाचारपत्र एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे थे. इससे एक-दूसरे की राष्ट्रीय भावना को ठेस लग रही थी. कभी-कभी दो राष्ट्रों के बीच विवादास्पद प्रश्न पर समाचारपत्रों में इस तरह की आलोचना की जाती थी कि जनता पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता था.

    6. फ्रांस की बदले की भावना (France’s Revenge Spirit)
    जर्मनी का एकीकरण फ्रांस को पराजित कर के पूरा किया गया था. फ्रांस को अल्सस-लारेन का प्रदेश खोना पड़ा था. फ्रांस राष्ट्रीय अपमान को भूला नहीं था और वह जर्मनी से बदला लेना चाहता था. जर्मनी मोरक्को में फ्रांस का विरोध कर रहा था. इससे दोनों में मनमुटाव पैदा हुआ.

    7. अंतर्राष्ट्रीय अराजकता (International Anarchy)
    इस समय यूरोप में एक प्रकार से अंतर्राष्ट्रीय अराजकता फ़ैल चुकी थी. प्रत्येक राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा था. अपने हितों की रक्षा के लिए कोई भी देश अपने विरोधी के साथ संधि कर सकता था. स्वार्थी राष्ट्र की इस नीति ने विरोधाभास को जन्म दिया. इस परिस्थिति को रोकने के लिए कोई अंतर्राष्ट्रीय संस्था नहीं थी जिसके अभाव के कारण सभी राष्ट्र मनमानी कर रहे थे.

    8. सराजेवो हत्याकांड (Sarajevo Assassination)
    युद्ध का तात्कालिक कारण ऑस्ट्रिया (Austria) के राजकुमार आर्कड्यूक फ्रान्ज़ (Archduke Franz) की हत्या थी. राजकुमार की हत्या बोस्निया (Bosnia) की राजधानी सराजेवो (Sarajevo) में हुई थी. ऑस्ट्रिया की सरकार ने राजकुमार की हत्या के लिए सर्बिया को उत्तरदाई ठहराया और उसके समक्ष 12 कड़ी शर्तें रखीं. सर्बिया की सरकार ने सभी शर्तों को मानने में अपनी असमर्थता प्रकट की. सर्बिया की सरकार समस्या का समाधान महाशक्तियों के सम्मलेन द्वारा करना चाहती थी. किन्तु ऑस्ट्रिया के राजनीतिज्ञों और सैनिक पदाधिकारियों ने सर्बिया की प्रार्थना पर ध्यान नहीं दिया. ऑस्ट्रिया की सरकार ने 28 जुलाई, 1914 ई. को युद्ध की घोषणा कर अपनी सेना को सर्बिया पर आक्रमण करने का आदेश दिया. इस घटना से ही प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई. युद्ध की समाप्ति 11 नवम्बर, 1918 को हुई.

    सोमवार, 11 सितंबर 2017

    [विश्व इतिहास] फ्रांस की क्रांति – 1789 French Revolution

    By: Successlocator On: सितंबर 11, 2017
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  • फ्रांस की क्रांति (French Revolution): भूमिका
    18वीं शताब्दी के 70-80 के दशकों में विभिन्न कारणों से राजा और तत्कालीन राजव्यवस्था के प्रति फ्रांस के नागरिकों में विद्रोह की भावना पनप रही थी. यह विरोध धीरे-धीरे तीव्र होता चला गया. अंततोगत्वा 1789 में राजा लुई 16वाँ (Louis XVI) को एक सभा बुलानी पड़ी. इस सभा का नाम General State था. यह सभा कई वर्षों से बुलाई नहीं गयी थी. इसमें सामंतों के अतिरिक्त सामान्य वर्ग के भी प्रतिनिधि होते थे. इस सभा में जनता की माँगों पर जोरदार बहस हुई. स्पष्ट हो गया कि लोगों में व्यवस्था की बदलने की बैचैनी थी. इसी बैचैनी का यह परिणाम हुआ कि इस सभा के आयोजन के कुछ ही दिनों के बाद सामान्य नागरिकों का एक जुलूस बास्तिल नामक जेल पहुँच गया और उसके दरवाजे तोड़ डाले गए. सभी कैदी बाहर निकल गए. सच पूंछे तो नागरिक इस जेल को जनता के दमन का प्रतीक मानते थे. कुछ दिनों के बाद महिलाओं का एक दल राजा के वर्साय स्थित दरबार को घेरने निकल गया जिसके फलस्वरूप राजा को पेरिस चले जाना पड़ा. इसी बीच General State ने कई क्रांतिकारी कदम भी उठाना शुरू किए. यथा –  मानव के अधिकारों की घोषणा, मेट्रिक प्रणाली का आरम्भ, चर्च के प्रभाव का समापन, सामंतवाद की समाप्ति की घोषणा, दास प्रथा के अंत की घोषणा आदि. General State के सदस्यों में मतभेद भी हुए. कुछ लोग क्रांति के गति को धीमी रखना चाहते थे. कुछ अन्य प्रखर क्रान्ति के पोषक थे. इन लोगों में आपसी झगड़े भी होने लगे पर इनका नेतृत्व कट्टर क्रांतिकारियों के हाथ में रहा. बाद में इनके एक नेता Maximilian Robespierre हुआ जिसने हज़ारों को मौत के घाट उतार दिया. उसके एक वर्ष के नेतृत्व को आज भी आतंक का राज (Reign of terror) कहते हैं. इसकी परिणति स्वयं Louis 16th और उसकी रानी की हत्या से हुई. राजपरिवार के हत्या के पश्चात् यूरोप के अन्य राजाओं में क्रोध उत्पन्न हुआ और वे लोग संयुक्त सेना बना-बना कर क्रांतिकारियों के विरुद्ध लड़ने लगे. क्रांतिकारियों ने भी एक सेना बना ली जिसमें सामान्य वर्ग के लोग भी सम्मिलित हुए. क्रान्ति के नए-नए उत्साह के कारण क्रांतिकारियों की सेना बार-बार सफल हुई और उसका उत्साह बढ़ता चला गया. यह सेना फ्रांस के बाहर भी भूमि जीतने लगी. इसी बीच इस सेना का एक सेनापति जिसका नाम नेपोलियन बोनापार्ट था, अपनी विजयों के कारण बहुत लोकप्रिय हुआ. इधर फ्रांस के अन्दर कट्टर क्रांति से लोग ऊब चुके थे. इसका लाभ उठाते हुए और अपनी लोकप्रियता को भुनाते हुए नेपोलियन ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया और एक Consulate बना कर शासन चालने लगा. यह शासन क्रांतिकारी सिद्धांतों पर चलता रहा. अंततः नेपोलियन ने सम्राट की उपाधि अपने आप को प्रदान की और इस प्रकार फ्रांसमें राजतंत्र दुबारा लौट आया. इस प्रकार हम कह सकते हैं फ्रांस की क्रांति (French Revolution) अपनी चरम अवस्था में थी.

    1789 ई. की फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution) आधुनिक युग की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी. यह क्रांति (French Revolution) निरंकुश राजतंत्र, सामंती शोषण, वर्गीय विशेषाधिकार तथा प्रजा की भलाई के प्रति शासकों की उदासीनता के विरुद्ध प्रारंभ हुई थी. उस समय फ्रांस में न केवल शोषित और असंतुष्ट वर्ग की विद्दमान थे, बल्कि वहाँ के आर्थिक और राजनैतिक ढाँचा में भी विरोधाभास देखा जा सकता था. राजनैतिक शक्ति का केन्द्रीकरण हो चुका था. सम्पूर्ण देश की धुरी एकमात्र राज्य था. समाज का नेतृत्व शनैः शनैः बुद्धिजीवी वर्ग के हाथ में आ रहा था. राजा शासन का सर्वोच्च अधिकारी होता था. राजा की इच्छाएँ ही राज्य का कानून था. लोगों को किसी प्रकार का नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं था. राजा के अन्यायों और अत्याचारों से आम जनता परेशान थी. भाषण, लेखन और प्रकाशन पर कड़ा प्रतिबंध लगा हुआ था. लोगों को धार्मिक स्वंतत्रता भी  नहीं दी गयी थी. राष्ट्र की सम्पूर्ण आय पर राजा का निजी अधिकार था. सम्पूर्ण आमदनी राजा-रानी और दरबारियों के भोग-विलास तथा आमोद-प्रमोद पर खर्च हो जाता था. राज्य के उच्च पदों पर राजा के कृपापात्रों की नियुक्ति होती थी. स्थानीय स्वशासन का अभाव था. फ्रांसीसी समाज दो टुकड़ों में बँट कर रह गया था – एक सुविधा-प्राप्त वर्ग और दूसरा सुविधाहीन वर्ग.
    फ्रांस की क्रांति (French Revolution) का प्रभाव विश्वव्यापी हुआ. इसके फलस्वरूप निरंकुश शासन तथा सामंती व्यवस्था का अंत हुआ. प्रजातंत्रात्मक शासन-प्रणाली की नींव डाली गई. सामजिक, आर्थिक और धार्मिक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण सुधार लाये गए.

    राजनैतिक कारण
    i) निरंकुश राजतंत्र

    राजतंत्र की निरंकुशता फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution) का एक प्रमुख कारण था. राजा शासन का सर्वोच्च अधिकारी होता था. वह अपनी इच्छानुसार काम करता था. वह अपने को ईश्वर का प्रतिनिधि बतलाता था. राजा के कार्यों के आलोचकों को बिना कारण बताए जेल में डाल दिया जाता था. राजा के अन्यायों और अत्याचारों से आम जनता तबाह थी. वह निरंकुश से छुटकारा पाने के लिए कोशिश करने लगी.

    ii) स्वतंत्रताओं का अभाव

    फ्रान्स में शासन का अति केन्द्रीकरण था. शासन के सभी सूत्र राजा के हाथों में थे. भाषण, लेखन और प्रकाशन पर कड़ा प्रतिबंध लगा हुआ था. राजनैतिक स्वतंत्रता का पूर्ण अभाव था. लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता भी नहीं थी. बंदी प्रत्यक्षीकरण नियम की व्यवस्था नहीं थी. न्याय और स्वतंत्रता की इस नग्न अवहेलना के कारण लोगों का रोष धीरे-धीरे क्रांति का रूप ले रहा था.

    iii) राजप्रसाद का विलासी जीवन और धन का अपव्यय

    राष्ट्र की सम्पूर्ण आय पर राजा का निजी अधिकार था. सम्पूर्ण आमदनी राजा-रानी और दरबारियों के भोग-विलास तथा आमोद-प्रमोद पर खर्च हुआ होता था. रानी बहुमूल्य वस्तुएँ खरीदने में अपार धन खर्च करती थी. एक ओर किसानों, श्रमिकों को भरपेट भोजन नहीं मिलता था तो दूसरी ओर सामंत, कुलीन और राजपरिवार के सदस्य विलासिता का जीवन बिताते थे.

    iv) प्रशासनिक अव्यवस्था

    फ्रान्स का शासन बेढंगा और अव्यवस्थित था. सरकारी पदों पर नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं होती थी. राजा के कृपापात्रों की नियुक्ति राज्य के उच्च पदों पर होती थी. भिन्न-भिन्न प्रान्तों में अलग-अलग कानून थे. कानून की विविधता के चलते स्वच्छ न्याय की आशा करना बेकार था.

    सामजिक कारण
    i) पादरी वर्ग

    फ्रांसमें रोमन कैथोलिक चर्च की प्रधानता थी. चर्च एक स्वतंत्र संस्था के रूप में काम कर रहा था. इसका अपना अलग संगठन था, अपना न्यायालय था और धन प्राप्ति का स्रोत था. देश की भूमि का पाँचवा भाग चर्च के पास था. चर्च की वार्षिक आमदनी करीब तीस करोड़ रुपये थी. चर्च स्वयं करमुक्त था, लेकिन उसे लोगों पर कर लगाने का विशेष अधिकार प्राप्त था. चर्च की अपार संपत्ति से बड़े-बड़े पादरी भोग-विलास का जीवन बिताते थे. धर्म के कार्यों से उन्हें कोई मतलब नहीं था. वे पूर्णतया सांसारिक जीवन व्यतीत करते थे.

    ii) कुलीन वर्ग

    फ्रांसका कुलीन वर्ग सुविधायुक्त एवं सम्पन्न वर्ग था. कुलीनों को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे. वे राजकीय कर से मुक्त थे. राज्य, धर्म और सेना के उच्च पदों पर कुलीनों की नियुक्ति होती थी. वे किसानों से कर वसूल करते थे. वे वर्साय के राजमहल में जमे रहते और राजा को अपने प्रभाव में बनाए रखने की पूरी कोशिश करते थे. कुलीनों के विशेषाधिकार और उत्पीड़न ने साधारण लोगों को क्रांतिकारी बनाया था.

    iii) कृषक वर्ग

    किसानों का वर्ग सबसे अधिक शोषित और पीड़ित था. उन्हें कर का बोझ उठाना पड़ता था. उन्हें राज्य, चर्च और जमींदारों को अनेक प्रकार के कर देने पड़ते थे. कृषक वर्ग अपनी दशा में सुधार लान चाहते थे और यह सुधार सिर्फ एक क्रांति द्वारा ही आ सकती थी.

    iv) मजदूर वर्ग

    मजदूरों और कारीगरों की दशा अत्यंत दयनीय थी. औद्योगिक क्रान्ति के कारण घरेलू उद्योग-धंधों का विनाश हो चुका था और मजदूर वर्ग बेरोजगार हो गए थे. देहात के मजदूर रोजगार की तलाश में पेरिस भाग रहे थे. क्रांति के समय (French Revolution) मजदूर वर्ग का एक बड़ा गिरोह तैयार हो चुका था.

    v) मध्यम वर्ग

    माध्यम वर्ग के लोग सामजिक असमानता को समाप्त करना चाहते थे. चूँकि तत्कालीन शासन के प्रति सबसे अधिक असंतोष मध्यम वर्ग में था, इसलिए क्रांति (French Revolution) का संचालन और नेतृत्व इसी वर्ग ने किया.

    आर्थिक कारण
    विदेशी युद्ध और राजमहल के अपव्यय के कारण फ्रांस की आर्थिक स्थिति लचर हो गयी थी. आय से अधिक व्यय हो चुका था. खर्च पूरा करने के लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ रहा था. कर की असंतोषजनक व्यवस्था के साथ-साथ शासकों की फिजूलखर्ची से फ्रांसकी हालत और भी ख़राब हो गई थी.

    बौधिक जागरण
    विचारकों और दार्शनिकों ने फ्रांसकी राजनैतिक एवं सामाजिक बुराइयों की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया और तत्कालीन व्यवस्था के प्रति असंतोष, घृणा और विद्रोह की भावना को उभरा. Montesquieu, Voltaire, Jean-Jacques Rousseau के विचारों से मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित था. Montesquieu ने समाज और शासन-व्यवस्था की प्रसंशा Power-Separation Theory का प्रतिपादन किया. वाल्टेयर ने सामाजिक एवं धार्मिक कुप्रथाओं पर प्रहार किया. रूसो ने राजतंत्र का विरोध किया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बल दिया. उसने जनता की सार्वभौमिकता के सिद्धांत (Principles of Rational and Just Civic Association) का प्रतिपादन किया. इन लेखकों ने लोगों को मानसिक रूप से क्रान्ति के लिए तैयार किया.

    सैनिकों में असंतोष
    फ्रांस की सेना भी तत्कालीन शासन-व्यवस्था से असंतुष्ट थी. सेना में असंतोष फैलते ही शासन का पतन अवश्यम्भावी हो जाता है. सैनिकों को समय पर वेतन नहीं मिलता था. उनके खाने-पीने तथा रहने की उचित व्यवस्था नहीं थी. उन्हें युद्ध के समय पुराने अस्त्र-शस्त्र दिए जाते थे. ऐसी स्थिति में सेना में रोष का उत्पन्न होना स्वाभाविक था.

    फ्रांसीसी क्रांति के परिणाम
    निरंकुश शासन का अंत कर प्रजातंत्रात्मक शासन-प्रणाली की नींव डाली गई. प्रशासन के साथ-साथ सामजिक, धार्मिक एवं आर्थिक जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए. फ्रांस की क्रांति (French Revolution) ने निरंकुश शासन का अंत कर लोकप्रिय संप्रभुता के सिद्धांत को प्रतिपादित किया. क्रांति के पूर्व फ्रांसऔर अन्य यूरोपीय देशों के शासक निरंकुश थे. उनपर किसी प्रकार का वैधानिक अंकुश नहीं था. क्रांति ने राजा के विशेषाधिकारों और दैवी अधिकार सिद्धांत पर आघात किया. इस क्रांति के फलस्वरूप सामंती प्रथा (Feudal System) का अंत हो गया. कुलीनों के विदेषाधिकार समाप्त कर दिए गए. किसानों को सामंती कर से मुक्त कर दिया गया. कुलीनों और पादरियों के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गये. लोगों को भाषण-लेखन तथा विचार-अभीव्यक्ति का अधिकार दिया गया. फ्रांस की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए  कर-प्रणाली (tax system) में सुधार लाया गया. कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका को एक-दूसरे से पृथक् कर दिया गया. अब राजा को संसद के परामर्श से काम करना पड़ता था. न्याय को सुलभ बनाने के लिए न्यायालय का पुनर्गठन किया गया. सरकार के द्वारा सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था की गई. फ्रांसमें एक एक प्रकार की शासन-व्यवस्था स्थापित की गई, एक प्रकार के आर्थिक नियम बने और नाप-तौल की नयी व्यवस्था चालू की गई. लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता मिली. उन्हें किसी भी धर्म के पालन और प्रचार का अधिकार मिला. पादरियों को संविधान के प्रति वफादारी की शपथ लेनी पड़ती थी. French Revolution ने लोगों को विश्वास दिलाया कि राजा एक अनुबंध के अंतर्गत प्रजा के प्रति उत्तरदायी है. यदि राजा अनुबंध को भंग करता है तो प्रजा का अधिकार है कि वह राजा को पदच्युत कर दे. यूरोप के अनेक देशों में निरंकुश राजतंत्र को समाप्त कर प्रजातंत्र की स्थापना की गयी.