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शनिवार, 23 सितंबर 2017

गौतम बुद्ध : बौद्ध धर्म के विषय में संक्षिप्त जानकारी

By: Successlocator On: सितंबर 23, 2017
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  • गौतम बुद्ध का जन्म
    बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध थे. गौतम बुद्ध का जन्म 567 ई.पू. (born, according to Wikipedia) कपिलवस्तु के लुम्बनी नामक स्थान पर हुआ था. इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था. गौतम बुद्ध का विवाह 16 वर्ष की अवस्था में यशोधरा के साथ हुआ. इनके पुत्र का नाम राहुल था.

    गृह-त्याग और शिक्षा ग्रहण
    सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की अवस्था में गृह-त्याग किया, जिसे बौद्धधर्म में “महाभिनिष्क्रमण” कहा गया है. गृह-त्याग करने के बाद सिद्धार्थ (बुद्ध) ने वैशाली के आलारकलाम से सांख्य धर्षण की शिक्षा ग्रहण की. आलारकलाम सिद्धार्थ के प्रथम गुरु हुए थे. आलारकलाम के बाद सिद्धार्थ ने राजगीर के रुद्र्करामपुत्त से शिक्षा ग्रहण की.

    ज्ञान प्राप्ति
    35 वर्ष की आयु में वैशाख की पूर्णिमा की रात निरंजना (फल्गु) नदी के किनारे, पीपल के वृक्ष के नीचे, सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ था. ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जाने गए.

    प्रथम उपदेश
    बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ (ऋषिपतनम)  में दिया, जिसे बौद्ध ग्रंथों में “धर्मचक्र प्रवर्त्तन” कहा गया है. बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए.

    मृत्यु
    बुद्ध की मृत्यु 80 वर्ष की अवस्था में 483 ई.पू. में कुशीनगर (देवरिया, उत्तर प्रदेश) में चुंद द्वारा अर्पित भोजन करने के बाद हो गयी, जिसे बौद्ध धर्म में “महापरिनिर्वाण” कहा गया है.

    निर्वाण-प्राप्ति
    बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति के लिए निम्न दस शीलों पर बल दिया है. ये शील हैं –

    अहिंसा
    सत्य
    अस्तेय (चोरी नहीं करना)
    अपरिग्रह (किसी प्रकार की संपत्ति नहीं रखना)
    मदिरा सेवन नहीं करना
    असमय भोजन नहीं करना
    सुखप्रद बिस्तर पर नहीं सोना
    धन-संचय नहीं करना
    स्त्रियों से दूर रहना और
    नृत्य-गान आदि से दूर रहना
    अष्टांगिक मार्ग (Astangik Marg)
    बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग की बात कही है. ये मार्ग हैं –

    सम्यक् कर्मान्त
    सम्यक् संकल्प
    सम्यक् वाणी
    सम्यक् कर्मान्त
    सम्यक् आजीव
    सम्यक् व्यायाम
    सम्यक् स्मृति एवं
    सम्यक् समाधि


    “विश्व दुःखों से भरा है” का यह सिद्धांत बुद्ध ने उपनिषद् से लिया था. बौद्धसंघ में प्रविष्ट होने को “उपसंपदा” कहा गया है. बौद्ध धर्म के तीन रत्न (त्रिरत्न) हैं – बुद्ध, धम्म और संघ. चतुर्थ बौद्ध संगीति के पश्चात् बौद्ध धर्म दो भागों में विभाजित हो गया – हीनयान और महायान.

    गुरुवार, 21 सितंबर 2017

    सिख धर्म का संक्षिप्त इतिहास।

    By: Successlocator On: सितंबर 21, 2017
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  • सिख धर्म के लोग गुरुनानक देव के अनुयायी हैं. गुरुनानक देव का कालखंड 1469-1539 ई. है. सिख धर्म के लोग मुख्यतया पंजाब में रहते हैं. वे सभी धर्मों में निहित आधारभूत सत्य में विश्वास रखते हैं और उनका दृष्टिकोण धार्मिक अथवा साम्प्रदायिक पक्षपात से रहित और उदार है. 1538 ई. में गुरु नानक की मृत्यु के बाद सिखों का मुखिया गुरु कहलाने लगा. सिख धर्म का इतिहास बलिदानों का इतिहास है. आज हम इस आर्टिकल में सिख धर्म के दस गुरुओं और सिख धर्म के गौरवपूर्ण इतिहास (History) को आपके सामने रखेंगे. सिख धर्म के इतिहास (Brief History of Sikh Dharma) में गुरुओं की लिस्ट (Sikh Guru List) कुछ इस तरह है –




    गुरुनानक देव (1469-1539)
    अंगद (1539-1552)
    अमरदास (1552-1574)
    रामदास (1574-1581)
    अर्जुन (1581-1606)
    हरगोविन्द (1606-1645)
    हरराय (1645-1661)
    हरकिशन (1661-1664)
    तेग बहादुर (1664-1675)
    गुरु गोविन्द सिंह (1675-1708)
    गुरु नानक
    गुरु नानक (Guru Nanak) के सिख धर्म के प्रवर्तक थे. 1469 ई. में लाहौर के निकट तलवंडी अथवा आधुनिक ननकाना साहिब में खत्री परिवार में वे उत्पन्न हुए. वे साधु स्वभाव के धर्म-प्रचारक थे. उन्होंने अपना पूरा जीवन हिन्दू और इस्लाम धर्म की उन अच्छी बातों के प्रचार में लगाया जो समस्त मानव समाज के लिए कल्याणकारी है. गुरुनानक ने अत्यधिक तपस्या और अत्यधिक सांसारिक भोगविलास, अहंभाव और आडम्बर, स्वार्थपरता और असत्य बोलने से दूर रहने की शिक्षा दी. उन्होंने सभी को अपने धर्म का उपदेश दिया, फलतः हिन्दू और  मुसलामान, दोनों ही उनके अनुयायी हो गए. उनके स्वचरित पवित्र पद तथा शिक्षाएँ (बानियाँ) सिखों के धर्मग्रन्थ “ग्रन्थ साहिब” में संकलित हैं. नानक देव की मृत्यु 1539 में  हुई.

    गुरु अंगद
    गुरु अंगद (Guru Angada) सिखों के दूसरे गुरु हुए. इनको गुरु नानक देव ने ही इस पद  के लिए मनोनीत किया था. नानक इनको अपने शिष्यों में सबसे अधिक मानते थे और अपने दोनों पुत्रों को छोड़कर उन्होंने अंगद को ही अपना उत्तराधिकारी चुना. गुरु अंगद श्रेष्ठ चरित्रवान व्यक्ति और सिखों के उच्चकोटि के नेता थे जिन्होंने अनुयायियों का 14 वर्ष तक नेतृत्व किया.

    गुरु अमरदास
    गुरु अमरदास (Guru Amardas) सिखों के तीसरे गुरु थे. वे चरित्रवान और सदाचारी थे. उन्होंने सिख धर्म का व्यापक ढंग से प्रचार किया.

    गुरु रामदास
    चौथे गुरु रामदास (Guru Ramdas) अत्यंत साधु प्रकृति के व्यक्ति थे. उन्होंने अमृतसर में एक जलाशय से युक्त भू-भाग दान दिया, जिसपर आगे चलकर स्वर्ण मंदिर (golden temple) का निर्माण हुआ.

    गुरु अर्जुन
    सिख धर्म के इतिहास (Sikh Dharma History) में गुरु अर्जुन का महत्त्वपूर्ण स्थान है. पाँचवें गुरु अर्जुन (Guru Arjuna)ने  सिखों के “आदि ग्रन्थ” नामक धर्म ग्रन्थ का संकलन किया, जिसमें उनके पूर्व के चारों गुरुओं और कुछ हिन्दू और मुसलमान संतों की वाणी संकलित है. उन्होंने खालसा पंथ की आर्थिक स्थिति को दृढ़ता प्रदान करने के लिए प्रत्येक सिख से धार्मिक चंदा वसूल (धार्मिक कर) करने की प्रथा चलाई. जहाँगीर के आदेश पर गुरु अर्जुन का इस कारण वध कर दिया गया कि गुरु अर्जुन ने जहाँगीर के विद्रोही बेटे शहजादा खुसरो को दयापूर्वक शरण दिया था.

    गुरु हरगोविंद
    गुरु अर्जुन के पुत्र गुरु हरगोविंद (Guru Hargobind Sahib Ji)ने  सिखों का सैनिक संगठन किया. उन्होंने एक छोटी-सी सिखों की सेना एकत्र की. गुरु अर्जुन ने शाहजहाँ के विरुद्ध विद्रोह करके एक युद्ध में शाही सेना को हरा भी दिया. किन्तु बाद में उनको कश्मीर के पर्वतीय प्रदेश में शरण लेनी पड़ी.

    गुरु हरराय और गुरु किशन
    गुरु हरराय (Guru Har Rai) और गुरु किशन (Guru Kishan) के काल में कोई उल्लेखनीय घटना नहीं घटी. उन्होंने गुरु अर्जुन द्वारा प्रचलित धार्मिक चंदे की प्रथा और उनके पुत्र हर गोविन्द की की सैनिक-संगठन की नीति का अनुसरण करके खालसा पंथ को और भी शक्तिशाली बनाया.

    तेग बहादुर
    नवें गुरु तेग बहादुर (Guru Teg Bahadur) को औरंगजेब की दुष्ट प्रकृति का सामना करना पड़ा.  उसने गुरु तेग बहादुर को बंदी बनाकर उनके सामने प्रस्ताव रखा कि या तो इस्लाम धर्म स्वीकार करो अथवा प्राण देने को तैयार हो जाओ. बाद में उनका सिर दुष्ट औरंगजेब ने काट डाला. उनकी शहादत का समस्त सिख सम्प्रदाय, उनके पुत्र और अगले गुरु गोविन्द सिंह पर गंभीर प्रभाव पड़ा.

    गुरु गोविन्द सिंह
    गुरु गोविन्द सिंह (Guru Gobind Singh)  ने भली-भांति विचार करके शांतिप्रिय सिख सम्प्रदाय को सैनिक संगठन का रूप दिया जो दृढ़तापूर्वक मुसलामानों के अतिक्रमण और अत्याचारों का सामना कर सके. साथ ही उन्होंने सिखों में ऐसी अनुशासन की भावना भरी कि वे लड़ाकू शक्ति बन गए. उन्होंने अपने पंथ का नाम खालसा (पवित्र) रखा. साथ ही समस्त सिख समुदाय को एकता-सूत्र में बाँध कर के विचार से सिखों के केश, कच्छ, कड़ा, कृपाण और कंघा – पाँच वस्तुओं को आवश्यक रूप में धारण करने का आदेश दिया. उन्होंने पाहुल प्रथा का शुभारम्भ किया जिसके अनुसार सभी सिख समूह में जात-बंधन तोड़ने के उद्देश्य से एक ही कटोरे में प्रसाद ग्रहण करते थे.

    गुरु गोविन्द सिंह ने स्थानीय मुग़ल हाकिमों से कई युद्ध किये, जिनमें उनके दो बालक पुत्र मारे भी गए. पर इससे वे हतोत्साहित नहीं हुए. अपनी मृत्यु तक सिखों का संगठन करते रहे. 1708 ई. में एक अफगान ने उनकी हत्या कर दी.

    आगे चलकर गुरु गोविन्द सिंह की रचनाएँ भी संकलित हुईं और यह संकलन “गुरु ग्रन्थ साहब” का परिशिष्ट (appendix) बना.  समस्त सिख समुदाय उनका इतना आदर करता था कि उनकी मृत्यु के बाद गुरु पद ही समाप्त कर दिया गया. वैसे उनके मृत्यु के बाद ही बंदा वीर ने सिखों का नेतृत्व भार संभाल लिया. वीर वंदा के नेतृत्व में 1708 ई. से लेकर 1716 ई. तक सिख निरंतर मुगलों से लोहा लेते रहे, पर 1716 ई. में बंदा वीर बंदी बना लिया गया और बादशाह फर्रुखशियर (1713-1719ई.) की आज्ञा से हाथियों से रौंदवादकर उसकी निर्मम हत्या कर दी गई.

    सिख धर्म पर प्रहार – काला इतिहास (Black History)
    सैकड़ों सिखों को घोर यातनाएँ दी गयीं फिर भी इन अत्याचारों से खासला पंथ की सैनिक शक्ति को दबाया नहीं जा सका. गुरु के अभाव में, व्यक्तिगत नेतृत्व के स्थान पर, संगठन का भार कई व्यक्तियों के एक समूह पर आ पड़ा, जिन्होंने अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार अपने सहधर्मियों का संगठन किया.

    रविवार, 17 सितंबर 2017

    जैन धर्म का इतिहास।

    By: Successlocator On: सितंबर 17, 2017
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  • जैन धर्म और बौद्ध धर्म  में बड़ी समानता है. किन्तु अब यह साबित हो चुका है कि बौद्ध धर्म की तुलना में जैन धर्म अधिक प्राचीन है. जैनों का मानना है कि हमारे 24 तीर्थंकर हो चुके हैं जिनके द्वारा जैन धर्म की उत्पत्ति और विकास हुआ. क्या आपको पता है कि जैन धर्म के 13वें तीर्थंकर का नाम क्या है? यदि आप परीक्षा की तैयारी अच्छे से कर रहे हो तो आपको इसका जवाब मालूम होगा. उनका नाम है – पार्श्वनाथ. उनका जन्म ईसा के पूर्व 8वीं शताब्दी में हुआ. पार्श्वनाथ एक क्षत्रिय थे. उनके मुख्य सिद्धांत थे – सदैव सच बोलना, अहिंसा, चोरी न करना और धन का त्याग कर देना.

    24 तीर्थंकर के नाम और उनके चिन्ह
    1. श्री ऋषभनाथ- बैल
    2. श्री अजितनाथ- हाथी
    3. श्री संभवनाथ- अश्व (घोड़ा)
    4. श्री अभिनंदननाथ- बंदर
    5. श्री सुमतिनाथ- चकवा
    6. श्री पद्मप्रभ- कमल
    7. श्री सुपार्श्वनाथ- साथिया (स्वस्तिक)
    8. श्री चन्द्रप्रभ- चन्द्रमा
    9. श्री पुष्पदंत- मगर
    10. श्री शीतलनाथ- कल्पवृक्ष
    11. श्री श्रेयांसनाथ- गैंडा
    12. श्री वासुपूज्य- भैंसा
    13. श्री विमलनाथ- शूकर
    14. श्री अनंतनाथ- सेही
    15. श्री धर्मनाथ- वज्रदंड,
    16. श्री शांतिनाथ- मृग (हिरण)
    17. श्री कुंथुनाथ- बकरा
    18. श्री अरहनाथ- मछली
    19. श्री मल्लिनाथ- कलश
    20. श्री मुनिस्रुव्रतनाथ- कच्छप (कछुआ)
    21. श्री नमिनाथ- नीलकमल
    22. श्री नेमिनाथ- शंख
    23. श्री पार्श्वनाथ- सर्प
    24. श्री महावीर- सिंह

    महावीर स्वामी
    परन्तु जैन धर्म के मूलप्रवर्त्तक के विषय में यदि बात की जाए तो महावीर स्वामी का नाम सामने आता है. इनका जन्म 540 ई.पू. के आस-पास हुआ था. इनके बचपन का नाम वर्धमान था. वह लिच्छवी वंश के थे. वैशाली (जो आज बिहार के हाजीपुर जिले में है) में उनका साम्राज्य था. गौतम बुद्ध  की ही तरह राजकुमार वर्धमान ने राजपाट छोड़ दिया और 30 वर्ष की अवस्था में कहीं दूर जा कर 12 वर्ष की कठोर तपस्या की. इस पूरी अवधि के दौरान वे अहिंसा के पथ से भटके नहीं और खान-पान में भी बहुत संयम से काम लिया. सच कहा जाए तो राजकुमार वर्धमान ने अपनी इन्द्रियों को सम्पूर्ण रूप से वश में कर लिया था. 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद, 13वें वर्ष में उनको महावीर और जिन (विजयी) के नाम से जाना जाने लगा. उन्हें परम ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी थी.

    महावीर स्वामी जैन परम्परा के 24वें तीर्थंकर कहलाए. उनके उपदेशों में कोई नई बात नहीं दिखती. पार्श्वनाथ की चार प्रतिज्ञाओं में उन्होंने एक पाँचवी प्रतिज्ञा और शामिल कर दी और वह थी – पवित्रता से जीवन बिताना. उनके शिष्य नग्न घूमते थे इसलिए वे निर्ग्रन्थ कहलाये. बुद्ध की भाँति ही महावीर स्वामी ने शरीर और मन की पवित्रता, अहिंसा और मोक्ष को जीवन का अंतिम उद्देश्य माना. पर उनका मोक्ष बुद्ध के निर्वाण से भिन्न है. आत्मा का परमात्मा से मिल जाना ही जैन धर्म में मोक्ष माना जाता है. जबकि बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म से मुक्ति ही निर्वाण है. लगभग 30 वर्षों तक महावीर स्वामी ने इन्हीं सिद्धांतों का प्रचार किया और 72 वर्ष की आयु में उन्होंने राजगीर के निकट पावापुरी नामक स्थान में अपना शरीर त्याग दिया.

    महावीर के उपदेश
    महावीर कहते थे कि जो भी जैन निर्वाण को प्राप्त करना चाहता है उसको स्वयं के आचरण, ज्ञान और विश्वास को शुद्ध करना चाहिए और पाँच प्रतिज्ञाओं का पालन अवश्य करना चाहिये. जैन धर्म में तप की बहुत महिमा है. उपवास को भी एक तप के रूप में देखा गया है. कोई भी मनुष्य बिना ध्यान, अनशन और तप किये  अन्दर से शुद्ध नहीं हो सकता. यदि वह स्वयं की आत्मा की मुक्ति चाहता है तो उसे ध्यान, अनशन और तप करना ही होगा. महावीर ने पूर्ण अहिंसा पर जोर दिया और तब से ही “अहिंसा परमो धर्मः” जैन धर्म में एक प्रधान सिद्धांत माना जाने लगा.

    दिगंबर और श्वेताम्बर
    300 ई.पू. के लगभग जैन धर्म दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया – दिगंबर और श्वेताम्बर. दिगम्बर नग्न मूर्ति की उपासना करते हैं और श्वेताम्बर अपनी मूर्तियों को श्वेत वस्त्र पहनाते हैं. 2011 के census के अनुसार भारत में जैन धर्म के अनुयायी 44 लाख 51 हजार हैं. इन्हें धनी और समृद्ध वर्ग में गिना जाता है. जैन धर्म के लोग अधिकांश व्यापारी वर्ग के हैं. जैन धर्म का प्रचार सब लोगों के बीच नहीं हुआ क्योंकि इसके नियम कठिन थे. राजाओं ने जैन धर्म को अपनाया और उनका प्रचार भी किया. अधिकांश वैश्य वर्गों ने जैन धर्म को अपनाया. जैन धर्म के अनुयायियों में बड़े-बड़े विद्वान् महात्मा भी शामिल हुए हैं.

    रविवार, 10 सितंबर 2017

    वेदों के विषय में संक्षिप्त विवरण – Vedas in Hindi

    By: Successlocator On: सितंबर 10, 2017
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  • वेद सनातन धर्म के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं. यहीं नहीं, ये विश्व के सबसे पुरानी कृतियाँ हैं. इन्हें संसार का आदिग्रंथ कहा जा सकता है. इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, मैं आपको बताना चाहूँगा कि वेद शब्द का अर्थ “ज्ञान” होता है. मूलतः वेद एक ही था. कालांतर में व्यास के द्वारा चार भागों में बाँटा गया. ये भाग अर्थात् संहिताएँ हैं –  ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद (Rigveda, Samveda, Yajurveda and Atharvaveda – four vedas). इनके प्रधान विषय क्रमशः प्राथना-मन्त्र, ऋचा-गायन, यज्ञ-मन्त्र और औषधीय ज्ञान हैं. वेदों का काल निश्चित नहीं है. इन्हें अपौरुषेय बताया गया है अर्थात् ये मानव रचित नहीं हैं, ऐसा माना जाता है. परन्तु कई ऋचाओं के रचनाकार ऋषियों के नाम ऋचाओं में मिलते हैं. इनमें पुरुष और स्त्रियाँ दोनों सम्मिलित हैं. अतः वेदों के रचनाकार का निर्धारण एक कठिन कार्य है. कुछ लोग इन्हें ईशा के 6000 वर्ष पूर्व के मानते हैं और कुछ इनका रचनाकाल 1500 ई.पू. बतलाते हैं. प्रत्येक वेद के अपने-अपने ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् तथा उपवेद (Brahman, Aranyak, Upnishada and Upveda) हैं. इनका वर्णन नीचे द्रष्टव्य है –

    ऋग्वेद (Rig Veda)
    चार वेदों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन है. ऋग्वेद शब्द ऋक् (ऋचा अथवा मन्त्र) तथा वेद (विद् अर्थात् ज्ञान) से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है ज्ञान के सूक्त. ऋग्वेद (Rig veda)की संहिता (text) में 10 मंडल, 1028 सूक्त और 10, 580 ऋचाएँ हैं. ऋग्वेद के अनेक मन्त्र यज्ञ से सम्बंधित हैं परन्तु उसमें कुछ ऐसे मन्त्र भी मिलते हैं जिन्हें आदिकालीन धार्मिक कविता का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण कहा जा सकता है.  ऋग्वेद (Rig veda) का रचनाकाल चाहे जो भी निर्धारित हो, इतना निश्चयपूर्ण कहा जा सकता है कि ऋग्वेद में भारतीय आर्यों के प्राचीनतम युग का इतिहास और उस युग की धार्मिक, सामजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक अवस्था का ज्ञान प्राप्त होता है.

    i) ब्राह्मण – ऐतरेय ब्राह्मण और कौशीतकी ब्राह्मण

    ii) आरण्यक – ऐतरेय आरण्यक, कौशीतकी

    iii) उपनिषद् – ऐतरेय उपनिषद्

    iv) उपवेद – आयुर्वेद

    सामवेद (Samveda)
    इस वेद में कुल 1549 ऋचाएँ हैं जिनमें से 75 को छोड़कर सभी ऋग्वेद संहिता (Rigved Samhita) से ली गई हैं. सामवेद (Samveda) की ऋचाओं का गान विविध वैदिक यज्ञों के अवसर पर होता था. सामवेद (Samveda) को संगीत-शास्त्र का आदि ग्रन्थ माना जाता है.

    i) ब्राह्मण:-  पंचविश ब्राह्मण, जैमिनीय ब्राह्मण और सद्विंश ब्राह्मण

    ii) आरण्यक:- तवलकर, छान्दोग्य

    iii) उपनिषद्:- छान्दोग्य, जैमिनीय और केन उपनिषद्

    iv) उपवेद:- गन्धर्ववेद

    यजुर्वेद (Yajurveda)
    यजुर्वेद (Yajurveda) की दो शाखाएँ हैं – कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद. कृष्ण यजुर्वेद दक्षिण भारत और शुक्ल यजुर्वेद उत्तर भारत में प्रचलित है. यजुर्वेद (Yajurveda) में 18 काण्ड हैं. यजुर्वेद में 3988 मन्त्र हैं. गायत्री मन्त्र और महामृत्युंजय मन्त्र यजुर्वेद में ही हैं. यजुर्वेद (Yajurveda) का प्रधान विषय यज्ञ कार्य है.

    i) ब्राह्मण – तैत्तिरीय ब्राह्मण

    ii) आरण्यक – वृहदारण्यक, तैत्तिरीय और मैत्रायणी

    iii) उपनिषद् – मुण्डक उपनिषद्, ईशावास्योपनिषद्, माण्डुक्य उपनिषद् और प्रश्न उपनिषद्

    iv) उपवेद:- धनुर्वेद

    अथर्ववेद (Atharva Veda )
    अथर्वेद में 20 अध्याय और 5687 मन्त्र हैं. अथर्ववेद (Atharvaveda) के 8 खंड हैं. अथर्वेद गद्य-पद्य-मिश्रित है. इसमें औषाधियों, जादू-टोनों आदि विषय हैं. कुछ विद्वानों के अनुसार इस वेद के कई अंश ऋग्वेद (Rig veda) से प्राचीनतर हैं.

    i) ब्राह्मण – गोपथ ब्राह्मण

    ii) आरण्यक – इसका कोई स्वतंत्र आरण्यक नहीं है. यजुर्वेद के आरण्यक के कुछ अंश अथर्ववेद (Atharvaveda) के आरण्यक के रूप में जाने जाते हैं.

    iii) उपनिषद् – इसका कोई स्वतंत्र उपनिषद् भी नहीं है. यजुर्वेद (Yajurveda) के उपनिषद् के कुछ अंश अथर्ववेद (Atharvaveda) के उपनिषद् के रूप में जाने जाते हैं.

    iv) उपवेद:- स्थापत्यवेद

    शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

    गुरु नानक देव जी मक्काजाने से जुड़ी कहानी।

    By: Successlocator On: सितंबर 08, 2017
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  • गुरु नानक जी के दो चेले थे एक का नाम था बाला और एक का नाम था मरदाना एक हिंदू और एक मुस्लिम। एक बार मरदाना ने गुरु जी से कहा कि मैं मक्का जाना चाहता हूं क्योंकि मुसलमान एक सच्चा मुसलमान तब तक नहीं कहलाता जब तक वह मक्का ना जाए । यह बात सुनकर गुरुजी उन्हें मक्का लेकर गए । मक्का पहुंचते-पहुंचते गुरूजी बहुत थक गए थे और वहां हाजियों के लिए बने आरामगाह में मक्का की तरफ पैर करके लेट गए।

    आरामगाह में हाजियों की सेवा करने वाला खातिम जिसका नाम जियोन था वह यह देखकर बहुत गुस्सा हुआ और गुरु जी से बोला कि तुम कैसा आदमी है तुमको दिखता नहीं है कि वहां पर मक्का मदीना है और तुम उस तरफ पैर करके लेटे हो । तब गुरु जी बोले गुस्सा मत करो मैं बहुत थका हुआ हूं मुझे आराम चाहिए। मैं भी तुम्हारी तरह खुदा को मानता हूं तभी तो मैं यहां आया हूं मुझे नहीं पता कि खुदा का घर कहां है पर तुम्हें तो पता है तो तुम ही मेरे पांव उस तरफ कर दो।

    परंतु जैसे ही वह गुरु जी का पांव दूसरी तरफ करता है मक्का भी उसी और चला जाता है। यह देखकर जीयोन को समझ आ जाता है कि यह शख्स कोई आम आदमी नहीं है खुदा का बंदा है और जीयोन तुरंत ही गुरु जी से माफी मांग लेता है। गुरुजी उसे कहते हैं ऐ खुदा के बंदे खुदा दिशाओं में वास नहीं करते वह तो दिलों में राज करते हैं। अच्छे कर्म करो और खुदा को दिल में रखो यही खुदा का सच्चा सदका है।

    बुधवार, 6 सितंबर 2017

    विश्वामित्र ने कैसे पाई ब्रह्मर्षि का उपाधि

    By: Successlocator On: सितंबर 06, 2017
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  • विश्वामित्र ने ऋषि, महर्षि और उसके बाद राजर्षि तक की उपाधि पा ली थी मगर कोई उन्हें ब्रह्मर्षि का दर्जा नहीं दे रहा था। जब भी कहीं ऐसी कोई चर्चा चलती, उन्हें यही सुनने को मिलता कि ब्रह्मर्षि तो वशिष्ठ हैं। उन्होंने और कठिन तपस्या शुरू की। कहते हैं कि उनके तप के प्रभाव से दिग-दिगंत कांप उठे, पर लंबी तपस्या का भी वैसा कोई फल नहीं मिला जैसा विश्वामित्र चाहते थे। आखिर उनका धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने तपस्या छोड़ी और चल पड़े वशिष्ठ के आश्रम की ओर कि आज नहीं छोड़ूंगा उसे।
    उन्हें लग रहा था कि जरूर वशिष्ठ की इसमें कोई चाल है, वर्ना ऐसा क्या कि उनके अलावा दूसरा कोई ब्रह्मर्षि न बन सके।
    यही सब सोचते हुए विश्वामित्र वशिष्ठ के आश्रम तक पहुंच गए। उन्होंने देखा कि चांदनी रात में वशिष्ठ बैठे अपने शिष्यों के साथ बातचीत कर रहे हैं। वहीं पास की झाड़ी में छिप कर वह गुरु और शिष्यों के बीच की बातचीत सुनने लगे। शिष्य ने वशिष्ठ से पूछा, ‘‘गुरुवर स्वच्छ आकाश में प्रकाश फैला रहे इस शीतल चांद को देख कर आपके मन में कौन से भाव आ रहे हैं।’’
    वशिष्ठ बोले, ‘‘चांद की चांदनी वैसे ही पूरे संसार को प्रकाशित कर रही है जैसे ऋषि विश्वामित्र का यश।’’ विश्वामित्र चकित रह गए। कहां तो मैं इन्हें मारने चला था और कहां यह मेरी प्रशंसा कर रहे हैं। वह सामने आए और सीधे वशिष्ठ के चरणों पर गिर पड़े, ‘‘क्षमा ऋषि प्रवर, क्षमा।’’
    वशिष्ठ ने उन्हें उठाते हुए कहा, ‘‘उठो ब्रह्मर्षि।’’ इस बार विश्वामित्र समेत समस्त शिष्टमंडली चौंक पड़ी, पर वशिष्ठ मुस्कुराते खड़े थे। उन्होंने कहा, ‘‘विश्वामित्र हर तरह से योग्य थे, बस उनका अहं और इस पद की लालसा उनके मार्ग की बाधा थी। जैसे ही वह पश्चाताप के आंसुओं के साथ झुके, दोनों बाधाएं तत्क्षण दूर हो गईं और वह पद उन्हें मिल गया जिसके वह अधिकारी थे।’’

    सोमवार, 4 सितंबर 2017

    भारत मे बहाई धर्म की कहानी।

    By: Successlocator On: सितंबर 04, 2017
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  • बहाई धर्म उन्नीसवीं सदी के ईरान में सन 1844 में स्थापित एक नया धर्म था, जो एकेश्वरवाद और विश्वभर के विभिन्न धर्मों और पंथों की एकमात्र आधारशिला पर जोर देता है. इस धर्म की स्थापना बहाउल्लाह ने की थी और इसके मतों के मुताबिक दुनिया के सभी मानव धर्मों का एक ही मूल है.
    इसके अनुसार कई लोगों ने ईश्वर का संदेश इंसानों तक पहुंचाने के लिए नए धर्मों का प्रतिपादन किया जो उस समय और परिवेश के लिए उपयुक्त है।
    तो आइए जानते हैं बहाई धर्म के बारे में 8 रोचक तथ्य…

    1. बहाई धर्म के अनुयायी बहाउल्लाह को पूर्व के अवतारों कृष्ण, ईसा मसीह, मुहम्मद, बुद्ध, जरथुस्त्र, मूसा आदि का पुर्नजन्म माना जाता है. इस धर्म के लोग बहाउल्लाह को कल्कि अवतार के रूप में भी मानते हैं.
    2. बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह का जन्म आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व तेहरान (ईरान) में हुआ था. बहाउल्लाह का शाब्दिक अर्थ है – ‘ईश्वरीय प्रकाश’ या ‘परमात्मा का प्रताप’.

    Image: Bahai Rants
    3. बहाउल्लाह को प्रभु का कार्य करने के कारण तत्कालिक शासक के आदेश से 40 वर्षों तक जेल में असहनीय कष्ट सहने पड़े. जेल में उनके गले में लोहे की मोटी जंजीर डाली गई तथा उन्हें कई तरह की कठोर यातनायें दी गई.
    भारत में बहाई धर्म कैसे आया ?

    4. भारत में बहाई धर्म से इसके स्थापना वर्ष 1844 से ही जुड़ा हुआ है. असल में जिन 18 पवित्र आत्माओं ने ‘महात्मा बाब’, ‘भगवान बहाउल्लाह’ के अग्रदूत को पहचाना और स्वीकार किया था, उन में से एक व्यक्ति भारत के रहने वाले थे और इस तरह से ये धर्म भारत आया.
    5. ‘बहाउल्लाह’ ने लोगों को यह संदेश दिया कि सम्पूर्ण मानव एक जाति है और वह समय आ गया है, जब वह एक वैश्विक समाज में बदल जाये.
    6. बहाउल्लाह द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘किताब-ए-अकदस’ में इसके सिद्धांतों का विवरण मिलता है. यह किताब 1873 के आसपास लिखी गई थी. इस किताब को इसके फारसी नाम ‘किताब-ए-अकदस’ से अधिक जाना जाता है.


    7. बहाई धर्म के अनुयायी पूरी दुनिया के लगभग 180 देशों में समाज-नवनिर्माण के कामों में लगे हुए हैं. बहाई धर्म में धर्म गुरु, पुजारी, मौलवी या पादरी वर्ग नहीं होता है.
    8. ‘बहाई उपासना मन्दिर’ जोकि ‘लोटस टेम्पल’ के नाम से जाना जाता है, कालका जी, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली में स्थित है. बहाई धर्म के पूरी दुनिया में कुल 7 देशों में मन्दिर बनाये गये हैं जो कि वेस्टर्न समोआ, सिडनी – औस्ट्रेलिया, कम्पाला- युगान्डा, पनामा सिटी – पनामा, फ्रेन्क्फर्ट्- जर्मनी और विलमेट, अमेरिका और नई दिल्ली, भारत में मौजूद हैं.

    रविवार, 3 सितंबर 2017

    भगवान विष्णु का अंतिम अवतार

    By: Successlocator On: सितंबर 03, 2017
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  • हमारे धर्मशास्त्रों में भगवान कल्कि की दसवें अवतार के रूप में चर्चा है। कहा गया है कि ज्यों-ज्यों घोर कलियुग आता जाएगा, त्यों-त्यों दिनों-दिन धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु और बल का लोप होता जाएगा। कलियुग में जिसके पास धन होगा उसी को लोग कुलीन, सदाचारी और सद्गुणी मानेंगे जो जितना छल, कपट  कर सकेगा वह उतना ही व्यवहार-कुशल माना जाएगा। धर्म का सेवन यश के लिए किया जाएगा।
    शास्त्र कहते हैं- कलियुग के अंतिम दिनों में शम्भल ग्राम में विष्णु यश नाम के एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होंगे। उनका हृदय बड़ा उदार होगा। वह भगवान के परम भक्त होंगे। उन्हीं के घर कल्कि भगवान अवतार ग्रहण करेंगे। वह देव दत्त नामक घोड़े पर सवार होकर दुष्टों को तलवार के घाट उतारेंगे तथा पृथ्वी पर विलुप्त धर्म की पुन: स्थापना करेंगे।
    भगवान के जन्म का चंद्रमा धनिष्ठा नक्षत्र और कुंभ राशि में होगा। सूर्य तुला राशि में स्वाति नक्षत्र में गोचर करेगा। गुरु स्वराशि धनु में और शनि अपनी उच्च राशि तुला में विराजमान होगा। वह ब्राह्मण कुमार बहुत ही बलवान, बुद्धिमान और पराक्रमी होगा। मन में सोचते ही उनके पास वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जाएंगे। वह सब दुष्टों का नाश करेंगे तब सतयुग शुरू होगा। वह धर्म के अनुसार विजय पाकर चक्रवर्ती राजा बनेंगे। वह अपने माता-पिता की पांचवीं संतान होंगे। भगवान कल्कि के पिता का नाम विष्णु यश और माता का नाम सुमति होगा।
    पिता विष्णु यश का अर्थ हुआ, ऐसा व्यक्ति जो सर्वव्यापक परमात्मा की स्तुति करता लोकहितैषी है। सुमति का अर्थ है अच्छे विचार रखने और वेद, पुराण तथा विद्याओं को जानने वाली महिला। कल्कि निष्कलंक अवतार हैं। भगवान का स्वरूप (सगुण रूप) परम दिव्य है। दिव्य अर्थात दैवीय गुणों से सम्पन्न। वह सफेद घोड़े पर सवार हैं।
    भगवान का रंग गोरा है लेकिन गुस्से में काला भी हो जाता है। प्रभु के हृदय पर श्रीवत्स का चिन्ह अंकित है। गले में कौस्तुभ मणि है। युद्ध के समय उनके हाथों में दो तलवारें होती हैं। कल्कि को विष्णु का भावी और अंतिम अवतार माना गया है। पृथ्वी पर पाप की सीमा पार होने लगेगी तब दुष्टों के संहार के लिए विष्णु का यह अवतार प्रकट होगा। भगवान का यह अवतार दिशा धारा में बदलाव का बहुत बड़ा प्रतीक होगा।
    भगवान जब कल्कि के रूप में अवतार ग्रहण करेंगे उसी समय सतयुग का प्रारंभ हो जाएगा। प्रजा सुख-चैन से रहने लगेगी।

    शनिवार, 2 सितंबर 2017

    हनुमान जी ने हस्तलिखित रामायण का क्या हुआ।

    By: Successlocator On: सितंबर 02, 2017
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  • रामायाण को हिन्दूओं का पवित्र ग्रन्थ माना जाता हैं। जनमानस जानता है कि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी। लेकिन बहुत ही कम लोगों को यह पता है कि महर्षि वाल्मीकि से पूर्व ही किसी और न भी रामायण को लिपिबद्ध कर दिया था। वह और कोई नहीं भगवान राम के परम भक्त हनुमान हैं।


    जब भगवान राम रावण को मार कर अयोध्या पहुंचे तो हनुमान भगवान शिव के पास चले गए। वहां पर उन्होंने अपने नाखूनों की सहायता से रामायण को लिपिबद्ध किया। जब महर्षि वाल्मीकि ने अपनी रचना लिपिबद्ध करने बाद शिव के पास उनको अपने कृति भेंट करने आए। तो उन्होंने देखा कि वहां पत्थरों पर कथा लिखी हुई हैं। यह देखकर वह निराश हुए और वह वापस जाने लगे।


    जब इस बात का पता हनुमान जी को चला तो वो महर्षि के पास आए। एक हाथ में हस्तलिखित पत्थर और दूसरे हाथ में महर्षि को लेकर समुद्र किनारे गए। वहां जाकर उन्होंने अपने रामायण को समुद्र में फेक दिया। इस प्रकार हनुमान जी द्वारा लिखित राम कथा का कोई अस्तित्व नहीं रहा।

    शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

    द्रोणाचार्य की मृत्यु की वजह क्यों बना ...

    By: Successlocator On: सितंबर 01, 2017
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  • महाभारत के अनुसार जब द्रोणाचार्य ने अपने शिष्य अर्जुन के दु्रपद को बंदी बनाकर अपने सामने लाने को कहा। तो अर्जुन ने गुरु की आज्ञा मानकर दुु्रपद को उनके सामने प्रस्तुत किया। गुरु द्रोणाचार्य ने अपने अपमान का बदला लेते हुए द्रुपद को आधा राज्य देकर मुक्त कर दिया।


    अपने अपमान और पराजय से महाराज द्रुपद काफी दुखी हुए और द्रोणाचार्य को नीचा दिखाने के लिए उपाय खोजने लगे। ऐसी ही काफी समय व्यतीत हो गया। एक बार वह कल्याणी नगर में स्थित ब्राह्मणों की बस्ती में पहुंचे। जहां उनकी मुलाकात दो ब्राह्मण भाइयों से हुई। राजा द्रुपद ने उनकी काफी सेवा की और गुरु द्रोणाचार्य की मौत का उपाय पूछा।


    ब्राह्मण भाईयों ने उनको यज्ञ एक विशाल यज्ञ कर अग्निदेव को खुश करने को कहा। तब महाराज दु्रपद ने उनसे ही यह यज्ञ करने को कहा। वो दोनों भाई इसके लिए तैयार हो गए। यज्ञ सम्पन्न होने पर हवन कुण्ड से एक बालक की उत्पत्ति हुई। जो सम्पूर्ण अस्त्र और शस्त्र से सुज्जित था। जिसका नाम धृष्टद्युम्न रखा गया जो आगे चलकर गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु की वजह बना।

    गुरुवार, 31 अगस्त 2017

    क्यो युधिष्ठिर ने ब्राह्मणों को दी पृथ्वी दान!

    By: Successlocator On: अगस्त 31, 2017
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  • महाभारत एक ऐसी कथा है जिसके साथ में कई रोचक किस्से जुड़े हुए हैं। ऐसा ही एक कथा है जब युधिष्ठिन ने अश्वमेघ यज्ञ करने का प्रण किया तो अर्जुन ने समस्त पृथ्वी पर युधिष्ठिर का एक छत्र राज स्थापित कर दिया। यह देखकर युधिष्ठिर के साथ वहां उपस्थित सभी लोग काफी उत्साहित व हर्षित हुए।
    फिर भगवान कृष्ण की निगरानी में यज्ञ के लिए भूमि का चयन किया गया। शुभ दिन और शुभ मुहूर्त पर यज्ञ प्रारम्भ हुआ। यज्ञ में शामिल होने के लिए दूर-दूर से राजा-महाराजाओं को आमंत्रित किया गया और सभी इस वैभवशाली यज्ञ को देखने के लिए वहां उपस्थित हुए।


    पाण्डवों ने यज्ञ में आए सभी अतिथियों का उचित आदर सत्कार किया। जब यज्ञ पूर्ण हुआ तो युधिष्ठिर ने सम्पूर्ण धरती ब्राह्मणों को दान में दे दी। लेकिन महर्षि वेदव्यास ने ब्राह्मणों का प्रतिनिधि बनकर वापस से सम्पूर्ण धरती युधिष्ठिर को वापस दे दी। इसके बदले उन्होंने ब्राह्मणों को सोना देने को कहा।


    युधिष्ठिर ने वेदव्यास की बात मानते हुए ब्राह्मणों को सोना दान में दिया। जिसको पाकर ब्राह्मण काफी खुश हुए और उन्होंने युधिष्ठिर को आर्शीवाद दिए। इस प्रकार भगवान कृष्ण के निर्देशन में अश्वमेघ यज्ञ सकुशल संपन्न हुआ।

    सोमवार, 9 जनवरी 2017

    महाभारत की 11 अनोखी कहानियां

    By: Successlocator On: जनवरी 09, 2017
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  • 1. जब कौरवों की सेना पांडवों से युद्ध हार रही थी तब दुर्योधन भीष्म पितामह के पास गया और उन्हें कहने लगा कि आप अपनी पूरी शक्ति से यह युद्ध नहीं लड़ रहे हैं. भीष्म पितामह को काफी गुस्सा आया और उन्होंने तुरंत पांच सोने के तीर लिए और कुछ मंत्र पढ़े. मंत्र पढ़ने के बाद उन्होंने दुर्योधन से कहा कि कल इन पांच तीरों से वे पांडवों को मार देंगे. मगर दुर्योधन को भीष्म पितामह के ऊपर विश्वास नहीं हुआ और उसने तीर ले लिए और कहा कि वह कल सुबह इन तीरों को वापस करेगा. इन तीरों के पीछे की कहानी भी बहुत मजेदार है. भगवान कृष्ण को जब तीरों के बारे में पता चला तो उन्होंने अर्जुन को बुलाया और कहा कि तुम दुर्योधन के पास जाओ और पांचो तीर मांग लो.  दुर्योधन की जान तुमने एक बार गंधर्व से बचायी थी.  इसके बदले उसने कहा था कि कोई एक चीज जान बचाने के लिए मांग लो. समय आ गया है कि अभी तुम उन पांच सोने के तीर मांग लो. अर्जुन दुर्योधन के पास गया और उसने तीर मांगे. क्षत्रिय होने के नाते दुर्योधन ने अपने वचन को पूरा किया और तीर अर्जुन को दे दिए.

    2. द्रोणाचार्य को भारत का पहले टेस्ट ट्यूब बेबी माना जा सकता है. यह कहानी भी काफी रोचक है. द्रोणाचार्य के पिता महर्षि भारद्वाज थे और उनकी माता एक अप्सरा थीं. दरअसल, एक शाम भारद्वाज शाम में गंगा नहाने गए तभी उन्हें वहां एक अप्सरा नहाती हुई दिखाई दी. उसकी सुंदरता को देख ऋषि मंत्र मुग्ध हो गए और उनके शरीर से शुक्राणु निकला जिसे ऋषि ने एक मिट्टी के बर्तन में जमा करके अंधेरे में रख दिया. इसी से द्रोणाचार्य का जन्म हुआ.

    3. जब पांडवों के पिता पांडु मरने के करीब थे तो उन्होंने अपने पुत्रों से कहा कि बुद्धिमान बनने और ज्ञान हासिल करने के लिए वे उनका मस्तिष्क खा जाएं. केवल सहदेव ने उनकी इच्छा पूरी की और उनके मस्तिष्क को खा लिया. पहली बार खाने पर उसे दुनिया में हो चुकी चीजों के बारे में जानकारी मिली. दूसरी बार खाने पर उसने वर्तमान में घट रही चीजों के बारे में जाना और तीसरी बार खाने पर उसे भविष्य में क्या होनेवाला है, इसकी जानकारी मिली.

    4. अभिमन्यु की पत्नी वत्सला बलराम की बेटी थी. बलराम चाहते थे कि वत्सला की शादी दुर्योधन के बेटे लक्ष्मण से हो. वत्सला और अभिमन्यु एक-दूसरे से प्यार करते थे. अभिमन्यु ने वत्सला को पाने के लिए घटोत्कच की मदद ली. घटोत्कच ने लक्ष्मण को इतना डराया कि उसने कसम खा ली कि वह पूरी जिंदगी शादी नहीं करेगा.

    5. अर्जुन के बेटे इरावन ने अपने पिता की जीत के लिए खुद की बलि दी थी. बलि देने से पहले उसकी अंतमि इच्छा थी कि वह मरने से पहले शादी कर ले. मगर इस शादी के लिए कोई भी लड़की तैयार नहीं थी क्योंकि शादी के तुरंत बाद उसके पति को मरना था. इस स्थिति में भगवान कृष्ण ने मोहिनी का रूप लिया और इरावन से न केवल शादी की बल्कि एक पत्नी की तरह उसे विदा करते हुए रोए भी.

    6. सहदेव, जो अपने पिता का मस्तिष्क खाकर बुद्धिमान बना था. उसमें भविष्य देखने की क्षमता थी इसलिए दुर्योधन उसके पास गया और युद्ध शुरू करने से पहले उससे सही मुहूर्त के बारे में पूछा. सहदेव यह जानता था कि दुर्योधन उसका सबसे बड़ा शत्रु है फिर भी उसने युद्ध शुरू करने का सही समय बताया.

    7. धृतराष्ट्र का एक बेटा युयत्सु नाम का भी था. युयत्सु एक वैश्य महिला का बेटा था. दरअसल, धृतराष्ट्र के संबंध एक दासी के साथ थे जिससे युयत्सु पैदा हुआ था.

    8. महाभारत के युद्ध में उडुपी के राजा ने निरपेक्ष रहने का फैसला किया था. उडुपी का राजा न तो पांडव की तरफ से थे और न ही कौरव की तरफ से. उडुपी के राजा ने कृष्ण से कहा था कि कौरवों और पांडवों की इतनी बड़ी सेना को भोजन की जरूरत होगी और हम दोनों तरफ की सेनाओं को भोजन बनाकर खिलाएंगें. 18 दिन तक चलने वाले इस युद्ध में कभी भी खाना कम नहीं पड़ा. सेना ने जब राजा से इस बारे में पूछा तो उन्होंने इसका श्रेय कृष्ण को दिया. राजा ने कहा  कि जब कृष्ण भोजन करते हैं तो उनके आहार से उन्हें पता चल जाता है कि कल कितने लोग मरने वाले हैं और खाना इसी हिसाब से बनाया जाता है.

    9. जब दुर्योधन कुरूक्षेत्र के युद्ध क्षेत्र में आखिरी सांस से ले रहा था, उस समय उसने अपनी तीन उंगलियां उठा रखी थी. भगवान कृष्ण उसके पास गए और समझ गए कि दुर्योधन कहना चाहता है कि अगर वह तीन गलतियां युद्ध में ना करता तो युद्ध जीत लेता. मगर कृष्ण ने दुर्योधन को कहा कि अगर तुम कुछ भी कर लेते तब भी हार जाते. ऐसा सुनने के बाद दुर्योधन ने अपनी उंगली नीचे कर ली.

    10. कर्ण और दुर्योधन की दोस्ती के किस्से तो काफी मशहूर हैं. कर्ण और दुर्योधन की पत्नी दोनों एक बार शतरंज खेल रहे थे. इस खेल में कर्ण जीत रहा था तभी भानुमति ने दुर्योधन को आते देखा और खड़े होने की कोशिश की. दुर्योधन के आने के बारे में कर्ण को पता नहीं था. इसलिए जैसे ही भानुमति ने उठने की कोशिश की कर्ण ने उसे पकड़ना चाहा. भानुमति के बदले उसके मोतियों की माला उसके हाथ में आ गई और वह टूट गई. दुर्योधन तब तक कमरे में आ चुका था. दुर्योधन को देख कर भानुमति और कर्ण दोनों डर गए कि दुर्योधन को कहीं कुछ गलत शक ना हो जाए. मगर दुर्योधन को कर्ण पर काफी विश्वास था. उसने सिर्फ इतना कहा कि मोतियों को उठा लें.

    11. कर्ण दान करने के लिए काफी प्रसिद्ध था. कर्ण जब युद्ध क्षेत्र में आखिरी सांस ले रहा था तो भगवान कृष्ण ने उसकी दानशीलता की परीक्षा लेनी चाही. वे गरीब ब्राह्मण बनकर कर्ण के पास गए और कहा कि तुम्हारे बारे में काफी सुना है और तुमसे मुझे अभी कुछ उपहार चाहिए. कर्ण ने उत्तर में कहा कि आप जो भी चाहें मांग लें. ब्राह्मण ने सोना मांगा. कर्ण ने कहा कि सोना तो उसके दांत में है और आप इसे ले सकते हैं. ब्राह्मण ने जवाब दिया कि मैं इतना कायर नहीं हूं कि तुम्हारे  दांत तोड़ूं. कर्ण ने तब एक पत्थर उठाया और अपने दांत तोड़ लिए. ब्राह्मण ने इसे भी लेने से इंकार करते हुए कहा कि खून से सना हुआ यह सोना वह नहीं ले सकता. कर्ण ने इसके बाद एक बाण उठाया और आसमान की तरफ चलाया. इसके बाद बारिश होने लगी और दांत धुल गया.

    गुरुवार, 15 सितंबर 2016

    महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण को स्त्री बनकर करना पड़ा था इस योद्धा से विवाह

    By: Successlocator On: सितंबर 15, 2016
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  • भगवान श्रीकृष्ण जिन्हें कभी रणछोड़ तो कभी महाभारत का युद्ध करवाने वाले वाले कूटनीतिज्ञ के रूप में जाना जाता है. महाभारत में अर्जुन के सारथी रहे श्रीकृष्ण ने गीता के उपदेश के माध्यम से जीवन बारे में ऐसी कई बातें बताई है, जो आज भी सार्थक मानी जाती है. वहीं महाभारत की अनगिनत कहानियों और पात्रों के माध्यम से हमें जीवन के प्रति एक नजरिया भी मिलता है. महाभारत में ऐसी ही एक कहानी है अर्जुन पुत्र इरावन की. जिसने अपने पिता को विजय करवाने के लिए खुद की बलि दी थी. बलि देने से पहले उसकी अंतिम इच्छा थी कि वह मरने से पहले विवाह कर ले, लेकिन जिसकी मृत्यु निकट हो, भला उससे कौन-सी लड़की विवाह करना चाहेगी, इसलिए इस शादी के लिए कोई भी लड़की तैयार नहीं थी.


    इरावन ने इसलिए दी थी स्वंय की बलि
    महाभारत के प्रसंग में एक कहानी ये भी है कि पांडवों को अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए एक राजकुमार की बलि मां काली के सामने देनी थी, लेकिन कोई भी राजकुमार इसके लिए तैयार नहीं था. अपने पिता और परिवार की दुविधा देखते हुए इरावन ने स्वंय की बलि दे दी थी.

    अंतिम इच्छा को भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार किया पूरा
    मृत्यु से पहले इरावन ने विवाह करने की अपनी अंतिम इच्छा जताई. किसी भी लड़की के द्वारा विवाह प्रस्ताव स्वीकार न करने के कारण सभी दुविधा में पड़ गए. तब पांचों पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण से कोई मार्ग निकालने के लिए कहा. तब कोई दूसरा विकल्प न देखते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने मोहिनी रूप धारण कर लिया और इरावन की इच्छा पूरी करते हुए उनसे विवाह कर लिया. अपने पति इरावन की मृत्यु के बाद मोहिनी का रूप धारण किए श्रीकृष्ण ने एक विधवा के रूप में विलाप भी किया था.


    पौराणिक कहानियों के अनुसार माना जाता है कि श्रीकृष्ण के पुरूष होते हुए उन्हें स्त्री रूप धारण करना पड़ा,  इस वजह से वो किन्नर के रूप में माने गए. तब से इरावन किन्नरों के स्वामी भी माने जाते हैं और किन्नर उनसे विवाह  रचाते हैं

    बुधवार, 24 अगस्त 2016

    महाभारत के युद्ध में बचे थे केवल 18 योद्धा, जानिए इस अंक से जुड़े आश्चर्यजनक रहस्य

    By: Successlocator On: अगस्त 24, 2016
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  • अधिकतर लोग महाभारत में 18 की संख्या को 'कुरुक्षेत्र युद्ध के दिन' मानकर चलते हैं जिसे महाभारत का युद्ध भी कहा जाता है. दरअसल कौरवों और पांडवों के बीच लड़ा गया यह युद्ध 18 दिन तक चला था इस दौरान भगवान कृष्ण ने योद्धा अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था. लेकिन बहुत ही कम लोग जानते हैं कि महाभारत में बहुत सी बातें और घटनाएं हैं जिसका संबंध 18 अंक से है. आइए जानते हैं 18 अंक के महत्व को.


    श्रीमद्भगवत गीता में कुल 18 अध्याय
    अर्जुनविषादयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग, कर्मसंन्यासयोग, आत्मसंयमयोग, ज्ञानविज्ञानयोग, अक्षरब्रह्मयोग, राजविद्याराजगुह्ययोग, विभूतियोग, विश्वरूपदर्शनयोग, भक्तियोग, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञविभागयोग, गुणत्रयविभागयोग, पुरुषोत्तमयोग, दैवासुरसम्पद्विभागयोग, श्रद्धात्रयविभागयोग और मोक्षसंन्यासयोग।

    महाभारत ग्रंथ ‍की रचना के कुल 18 पर्व
    ऋषि वेदव्यास महाभारत के रचयिता ही नहीं, बल्कि उन घटनाओं के साक्षी भी रहे हैं, जो क्रमानुसार घटित हुई हैं. वेदव्यास ने जो महाभारत ग्रंथ ‍की रचना की उसमें कुल 18 पर्व है. ये हैं वह पर्व...
    आदि पर्व, सभा पर्व, वन पर्व, विराट पर्व, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, अश्वमेधिक पर्व, महाप्रस्थानिक पर्व, सौप्तिक पर्व, स्त्री पर्व, शांति पर्व, अनुशासन पर्व, मौसल पर्व, कर्ण पर्व, शल्य पर्व, स्वर्गारोहण पर्व तथा आश्रम्वासिक पर्व. वैसे माना जाता है कि उन्होंने 18 पुराण की भी रचना की थी.


    महाभारत में 18 के अंक के अन्य रहस्य
    1. ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि कौरवों और पांडवों की सेना भी कुल 18 अक्षोहिनी सेना थी, जिनमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 अक्षोहिनी सेना थी.
    2. युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी 18 थे,  जिनके नाम थे- धृतराष्ट्र,  दुर्योधन,  दुशासन,  कर्ण,  शकुनि,  भीष्म,  द्रोण,  कृपाचार्य,  अश्वत्थामा, कृतवर्मा,  श्रीकृष्ण,  युधिष्ठिर,  भीम,  अर्जुन,  नकुल,  सहदेव,  द्रौपदी एवं विदुर.
    3. महाभारत के युद्ध में ‘18’ का अंतिम सत्य ये है कि महाभारत के युद्ध के पश्चात कौरवों की तरफ से 3 और पांडवों के तरफ से 15 यानी कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे.
    इस तरह 18 दिनों तक चले रक्तरंजित युद्ध में ‘18’ अंक एक रहस्य की तरह है