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शनिवार, 23 सितंबर 2017
बंगाल का विभाजन अध्भुत घटना।
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On: सितंबर 23, 2017
लॉर्ड कर्जन एक घोर साम्राज्यवादी तथा प्रतिक्रियावादी वायसराय था. वह अंग्रेजों को भारतीयों की तुलना में अधिक श्रेष्ठ, योग्य और सभ्य मानता था. उसके दिल में भारतीयों के प्रति घृणा भरी थी और भारत को राष्ट्र मानने के लिए वह तैयार ही नहीं था. उसकी इसी रवैये ने भारत में असंतोष और उग्रवाद को बढ़ावा दिया. लॉर्ड कर्जन 1899 ई. से 1905 ई. तक भारत का वायसराय रहा. उसका सम्पूर्ण शासनकाल भूलों और गलतियों के लिए प्रसिद्ध था. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दूत के रूप में कर्जन ने भारत में क्षोभ और असंतोष का तूफ़ान खड़ा कर नव अंकुरित राष्ट्रीय आन्दोलन को कुचलने का काफी प्रयत्न किया. बंगाल विभाजन (Partition of Bengal) की योजना बनाना उसके हर कार्य से ज्यादा खतरनाक कार्य सिद्ध हुआ.
लॉर्ड कर्जन की कूटनीति
हालाँकि उसने बंगाल के विभाजन को प्रशासनिक दृष्टिकोण से आवश्यक बताया था लेकिन वास्तविकता यह थी कि बंगाल विभाजन (Partition of Bengal) उसकी प्रतिक्रियावादी नीति का ही परिणाम था. लॉर्ड कर्जन का तर्क था कि आकार की विशालता और कार्यभार की अधिकता के कारण बंगाल प्रांत का शासन एक गवर्नर के लिए संभव नहीं है. अतः उसने पूर्वी बंगाल और असम को मिलाकर एक अलग प्रांत बनाया जिसकी राजधानी ढाका रखी. वस्तुतः बंगाल विभाजन (Partition of Bengal) का यह तर्क कर्जन का एक बहाना था. उसका वास्तविक उद्देश्य तो बंगाल की राष्ट्रीय एकता को नष्ट कर हिन्दुओं और मुसलामानों के बीच फूट डालना था. उसकी स्पष्ट नीति थी फूट डालो और शासन करो. उसने खुद कहा भी था कि “यह बंगाल विभाजन (Partition of Bengal) केवल शासन की सुविधा के लिए नहीं की गई है बल्कि इसके द्वारा एक मुस्लिम प्रांत बनाया जा रहा है, जिसमें इस्लाम और उसके अनुयायियों की प्रधानता होगी.” इस प्रकार बंगाल का विभाजन (Partition of Bengal) लॉर्ड कर्जन का धूर्तता और कूटनीति से भरा कार्य था.
स्वदेशी लहर
बंगाल का विभाजन (Partition of Bengal) राष्ट्रीयता के इतिहास में एक मोड़ लानेवाली घटना थी. बंगाल विभाजन ने गंगा नदी के क्षेत्र में एक आग-सी लगा दी और पूरा बंगाल अपमानित और ठगा हुआ महसूस कर रहा था. 16 अक्टूबर, 1905 ई. का दिन जिस दिन बंगाल का विभाजन हुआ, विरोध दिवस के रूप में मनाया गया. जुलूस निकले, प्रदर्शनी हुई और सड़कें वन्दे मातरम् के नारे से गूँज उठीं. बंगाल ही नहीं पूरे देश में उत्तेजना व्याप्त हो गई. विरोध के स्वर को सरकार अनसुना कर रही थी अतः बंग-भंग आन्दोलन ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार का रूप धारण कर लिया. सभी स्कूल-कॉलेज विरोध प्रकट करने लगे.
बंगाल के राष्ट्रीय आन्दोलन के कुचलने के लिए सरकार ने अपना दमनचक्र प्रारम्भ किया. लोगों को जेल में डाल दिया गया और साम्प्रदायिक विभेद फैलाकर दंगे शुरू करवाए गए. दमन के कारण खुले रूप से विद्रोह करना असंभव था. इसलिए बंगाल के नवयुवकों ने गुप्त संगठनों का निर्माण कर अस्त्र-शास्त्रों को इकठ्ठा कर हिंसात्मक ढंग से सरकार का विरोध आरम्भ कर दिया. बंगाल विभाजन से स्वदेशी आन्दोलन को बल मिल गया. विदेशी वस्त्रों को जलाना, विदेशी वस्तुओं के दुकानों पर धरना देना राजनीतिक कार्यक्रम का अंग बन गया.
बंग प्रांत को ऐसे ढंग से बाँटा गया था कि पश्चिम बंगाल की जनसँख्या लगभग 5 करोड़ 40 लाख और पूर्वीय बंगाल की जनसँख्या लगभग 3 करोड़ 10 लाख हो. बंगाल के स्वदेश और स्वभाषा का अभियान रखनेवाले भावुक निवासियों को यह बँटवारा ऐसा प्रतीत हुआ मानो किसी हत्यारे ने उनकी जन्मभूमि को किसी छुरे से काटकर दो टुकड़ों में बाँट दिया ही. सारे प्रांत में एक ऐसा रोषभरा चीत्कार प्रादुर्भूत हुआ, जिसकी प्रतिध्वनि भारत के कोने-कोने से सुनाई पड़ने लगी.
बंगाल विभाजन के परिणाम
बंगाल विभाजन (Partition of Bengal) के परिणाम बहुत ही महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए. अब राष्ट्रवादियों का रोष चरम-सीमा तक पहुँच गया और भारत में राष्ट्रीयता की भावना प्रबल हुई. वास्तव में अब तक कोई ऐसी घटना नहीं घटी थी, जिसने भारतीय राजनीति को इस तरह प्रभावित किया हो. बंगाल विभाजन (Partition of Bengal) को आन्दोलन से घबरा कर सरकार ने रद्द तो कर दिया लेकिन विरोध का जो ज्वार एक बार उठा वह फिर रुका नहीं. कर्जन ने बंगाल विभाजन के द्वारा भारतीय राष्ट्रीयता को कुचलने का प्रयास किया था पर वह और ज्यादा बाधा ही. कर्जन की इच्छा थी कि ब्रिटिश साम्राज्य सुरक्षित हो और उसे स्थायित्व प्रदान हो पर बंगाल विभाजन और अपनी प्रतिक्रियावादी नीतियों के द्वारा उसने ब्रिटिश साम्राज्य का कब्र स्वयं ही तैयार कर दिया. यह बंग-भंग योजना अगली पीढ़ी के लिए वरदान साबित हुई. भारतवासियों में एक नए उत्साह का संचार हुआ. बंगाल का विभाजन (Partition of Bengal) कर्जन की एक बड़ी भूल साबित हुई, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को लाभ पहुँचाने की जगह हानि ही पहुँचाई.
शुक्रवार, 22 सितंबर 2017
1857 की क्रांति।
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On: सितंबर 22, 2017
आज हम 1857 ki Kranti के विषय चर्चा करेंगे।
ठीक है, तो बताइये कि १८५७ की क्रांति किस ब्रिटिश गवर्नर जनरल के शासन काल में हुई थी? नहीं पता है तो आगे पढ़िए.
लॉर्ड डलहौजी के पश्चात् लॉर्ड कैनिंग गवर्नल जनरल (governor general) बनकर भारत आया और इसी के शासन काल में १८५७ ई. में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह हुआ. शीघ्र ही यह विद्रोह मेरठ, कानपुर, बरेली, झाँसी, दिल्ली और लगभग पूरे भारत में जड़ें जमाने लगा.
ऐसे तो कई लोग 1857 ki Kranti के होने के कई कारण (Causes) देते हैं पर असल में यह एक सैनिक विद्रोह (Sepoy mutiny) ही था. इस विद्रोह का आगाज़ भारतीय सैनिकों द्वारा अपने अँगरेज़ सैनिक अधिकारियों के विरुद्ध हुआ, किन्तु तुरंत ही यह विद्रोह एक बड़ा रूप लेने लगा और एक जनव्यापी विद्रोह बन कर उभरा. 1857 ki Kranti को प्रथम भारतीय संग्राम भी कहा जाता है.
चलिए अब विद्रोह के कारण जान जाएँ (Reasons of this Mutiny)….
१८५७ विद्रोह के कारण
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१. राजनीतिक कारण
२. आर्थिक कारण
३. सामाजिक कारण
४. धार्मिक कारण
५. सैनिक कारण
६. तात्कालिक कारण
1857 के विद्रोह के राजनीतिक कारण- Political Causess of 1857 Revolt
१. लॉर्ड डलहौजी का Doctrine of Lapse, जिसे हिंदी में हड़प नीति कहा जा सकता है या भारत को हड़पने की नीति भी कह सकते हैं, इसके कारण तत्कालीन राजवंशों में असंतोष, आक्रोश व्याप्त हो गया था.
२. भले ही बहादुरशाह जफर एक नाममात्र का शासक था किन्तु उसको चाहने वाले अब भी बाकी थे. अंग्रेजों ने 1835 ई. के पश्चात् मुग़ल बादशाह का आदर सम्मान करना बंद कर दिया था जिससे कुछ बहादुर शाह को चाहने वाले अंग्रेजों से क्षुब्ध थे.
३. नाना साहब की पेंशन बंद हो गयी थी. ऐसे ही कई देशी नरेश व्यक्तिगत रूप से अंग्रेजों से क्षुब्ध चल रहे थे.
४. अंग्रेजों ने नौकरी देने के सम्बन्ध में भारतीयों के साथ भेदभाव किया. इसलिए भारतीय युवा भी ब्रिटिश शासन से खफा थे.
1857 के विद्रोह के आर्थिक कारण- Economic Causes of 1857 Rebellion
१. लॉर्ड विलियम बैंटिक ने भारतीय जमींदारों से उन्हें इनाम में मिली भूमि को छीन लिया था, परिणामस्वरूप भारतीय जमींदार गरीब और निस्सहाय हो गए थे.
२. अंग्रेजों की व्यापारिक नीति के कारण भारतीय उद्योग-धंदे चौपट हो गये थे. धंधे में लगे लोग बेरोजगार हो गए थे.
३. भारतीय किसान भी अंग्रेजों के लगान और रैयतवाड़ी या महलवाड़ी कु-व्यवस्थाओं के कारण क्रोधित थे. किसानों की दशा बद से बदतर हो गयी थी.
1857 के विद्रोह के सामाजिक कारण- Social Causes of 1857 Mutiny
१. अंग्रेजों ने जाति नियमों की उपेक्षा की. विलियम बैंटिक ने सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया. भारतीय रुढ़िवादी आहत थे.
२. अंग्रेजों द्वारा चलाये गए रेल, डाकतार आदि को भारतीयों ने भ्रमवश गलत अर्थ में लिया. उन्होंने सोचा कि ये साधन ईसाई धर्म के प्रचार के लिए है.
३. अंग्रेजों ने पाश्चात्य सभ्यता, संस्कृति, भाषा एवं साहित्य का अधिकाधिक प्रचार किया और भारतीय संस्कृति, भाषा-साहित्य को नीचा दिखाया, इससे भी लोग क्षुब्ध थे.
४. भारतीय रजवाड़ों को अपने अंकुश में रखा. रह-रह कर रजवाड़ों की बेज्जती भी करते थे.
1857 के विद्रोह के धार्मिक कारण- Religious Causes of 1857 ki Kranti
१. अँगरेज़ हिन्दू धर्म व इस्लाम की खुल कर आलोचना करते थे. इससे हिन्दू-मुस्लिम धर्म के लोगों को ठेस पहुँचती थी.
२. शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से अंग्रेजों ने ईसाई धर्म का जोर-शोर से प्रचार किया ताकि आने वाली भारतीय पीढ़ी का ईसाई धर्म के प्रति रुझान हो. इससे भी भारतीय रुष्ट थे.
३. ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों को सरकारी नौकरी, उच्च पद तथा अनेक सुविधाएँ प्रदान की गयीं. हिन्दू एवं मुस्लिम खुद को अलग-थलग महसूस करने लगे.
1857 के विद्रोह के सैनिक कारण- Military Causes of the Great Revolt of 1857
१. भारतीय सैनकों के साथ अँगरेज़ भेद-भाव करते थे, चाहे वह प्रोन्नति या नियुक्ति का मामला हो…हिन्दू-मुस्लिम को हेय दृष्टि से देखा जाता था.
२. प्रथम अफगान युद्ध में अंग्रेजों की पराजय से भारत में भारतीय सैनिकों के आत्मबल में वृद्धि हुई. उन्हें अब लगने लगा की अंग्रेज़ी शक्ति को भी परास्त किया जा सकता है.
३. मंगल पाण्डे वाली स्टोरी तो आप जानते ही होंगे. वही कारतूस वाला मामला. पर इसको तात्कालिक कारण में डालना ठीक होगा.
४. बंगाल सेना में जो ब्राह्मण, राजपूत जाति के थे, वे भारत देश से बाहर जाना नहीं चाहते थे, उन्हें लगता था कि बाहर जाकर उनका धर्म भ्रष्ट हो जायेगा. पर अंग्रेजों ने ऐलान किया कि सैनिकों को सेवा करने के लिए कहीं भी भेजा सकता है.
1857 के विद्रोह के तात्कालिक कारण- Immediate Causes of 1857 Sepoy Mutiny
लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल में सैनिकों को एक ऐसे कारतूस का प्रयोग करना पड़ा, जिसमें गाय और सूअर की चर्बी लगी थी जिसे मुँह से काटना पड़ता था (सच्ची????Oh my god)….इससे हिन्दू और मुसलमान सैनिकों में भारी रोष उत्पन्न हो गया.
विद्रोह के प्रमुख केंद्र और केंद्र के प्रमुख नेता (Leaders of revolt of 1857)
१. दिल्ली- बहादुरशाह (Bahadur Shah)
२. कानपुर- नाना साहब (Nana Saheb)
३. लखनऊ- बेगम हजरत महल (Beghum Hazrat Mahal)
४. इलाहाबाद- लियाकत अली (Liyaqat Ali)
५. झाँसी- रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmibai)
६. जगदीशपुर (बिहार)- कुँवर सिंह (Kunwar Singh)
विद्रोह की असफलता के कारण (Causes of Failure of 1857 ki Kranti)
1857 ई. में व्यापक पैमाने पर हुए इस विद्रोह में भारतीय सैनिकों की संख्या अंग्रेजों की सैनिकों की संख्या से कहीं अधिक थी. यही कारण रहा कि प्रारम्भ में अनेक स्थानों पर भारतीयों को सफलता प्राप्त हुई. किन्तु अंत में इस विद्रोह का दमन कर दिया गया.
१. विद्रोह का प्रारम्भ समय से पूर्व होना
विद्रोह की तिथि 31 मई, 1857 निर्धारित की गयी थी, किन्तु बैरकपुर में सैनिकों ने उत्साह में आकर समय से पूर्व ही विद्रोह कर दिया जिसके कारण भारत में एक साथ विद्रोह नहीं हो सका.
२. राष्ट्रीय भावना का अभाव
राष्ट्रीय भावना के अभाव के कारण भारतीय समाज के सभी वर्गों ने विद्रोह में साथ नहीं दिया बल्कि सामंतवर्ग अंग्रेजों के साथ ही चिपके रहे.
३. कमजोर नेतृत्व
लोग बहादुरशाह जफर को इतने बड़े विद्रोह का नेतृत्वकर्ता बनाने के फ़िराक में थे जो खुद अपने जीवन की उलटी गिनती गिन रहा था. लोगों की मानसिकता यह थी कि चूँकि मुगलों ने भारत पर इतने साल राज किया है, तो बहादुर शाह को ही इस विद्रोह की कमान सौंपी जाए.
बहादुर शाह एक कवि भी था. विद्रोह की असफलता, दिल्ली की बरबादी और अपनी बेबसी से खिन्न होकर उसने यह शेर लिखा था—
[Tweet “दमदमे में दम नहीं अब खैर मानो जान की… ऐ जफ़र ठंडी हुई शमशीर हिन्दुस्तान की.”]
४. सैनिक दुर्बलता
भारतीय सेना अंग्रेजी सेना के सामने कुछ नहीं थी. यही कड़वा सच है. अंग्रेजी सेना कुशल और संगठित थी और भारतीय सैनिकों में आपस में ही विभिन्न विचार और मत थे.
५. आवागमन तथा संचार के साधन
डलहौजी ने भारत में रेलवे और सड़कों पर बहुत काम किया था. संचार के जाल को फैलाने में उसका बहुत बड़ा हाथ था. ये सड़कें, पटरी पर दौड़ती रेलें अंग्रेजों के लिए युद्ध को दबाने के लिए बहुत सहायक सिद्ध हुए.
६. धन का अभाव
आज भी देश के रक्षा मंत्री कुछ शस्त्रों पर खर्च कर दें तो देश की जनता हो-हल्ला मचाने लगती है, कहने लगती है कि गरीबों पर खर्च करो, गरीबी दूर करो, फिर सैन्य सामग्री लेना. हद है.
1857 के समय भारत में क्रांतिकारियों के पास न पैसे थे और न उचित अस्त्र-शस्त्र. उनकी दयनीय स्थिति का अंग्रेजों ने भरपूर लाभ उठाया.
ये थे सन् सत्तावन की क्रांति में सामरिक हार के कारण. परन्तु इससे यह नहीं समझना कि वह क्रांति, क्रांति नहीं थी, या उसे राजनीतिक सफलता प्राप्त नहीं हुई. वह पहले दर्जे की क्रांति थी और उसे राजनीतिक दृष्टि से असाधारण सफलता प्राप्त हुई. 1958 के अंत में राजनीतिक दृष्टि से वह भारत सर्वथा लुप्त हो चुका था, जो 1857 के मई मास के आरम्भ में था. 57 की क्रांति ने उसकी अंतरात्मा में ऐसा भारी परिवर्तन कर दिया था कि लगभग एक सदी तक उसे दबाने की चेष्टा करके भी अंग्रेज सफल न हो सके. सन् १९४७ का राज्य-परिवर्तन सन् १८५७ की क्रान्ति की प्रेरणा का ही अंतिम फल था.
1857 ई. के विद्रोह के परिणाम (Consequences of revolt of 1857)
1857 ki Kranti के बाद ब्रिटेन में हल्ला मच गया. वहाँ के सरकार को लगने लगा कि ईस्ट इंडिया कंपनी भारत को संभाल नहीं पायेगी. 1858 ई. में ब्रिटिश संसद में एक कानून पारित हुआ और ईस्ट इंडिया कम्पनी के भारत में शासन का अंत कर दिया गया. भारत का शासन अब महारानी के हाथ में चला गया.
1858 ई. में पारित हुए कानून के अनुसार गवर्नर जनरल के पद में परिवर्तन कर उसे वायसराय नाम प्रदान किया गया. Viceroy (Vice = उप और Roy =राजा) अर्थात् राजा का प्रतिनिधि.
सेना का पुनर्गठन किया गया. अँगरेज़ सैनिकों की संख्या में वृद्धि की गयी. तोपखाना पूरी तरह से अंग्रेजों के अधीन कर दिया गया.
देर आये दुरुस्त आये. अब भारतीयों में राष्ट्रीय भावना के विकास ने गति पकड़ ली.
1858 ई. के अधिनियम के अंतर्गत ब्रिटेन में एक “भारतीय राज्य सचिव” का पद बनाया गया. इसके सहयोग के लिए 15 सदस्यों की एक “मंत्रणा परिषद्” भी बनाई गई. इन 15 सदस्यों में 8 लोगों की नियुक्ति सरकार द्वारा किए जाने और 7 की नियुक्ति कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स द्वारा चुने किये जाने का प्रावधान रखा गया.
सैन्य पुनर्गठन करने के लिए यूरोपीय सैनिकों की संख्या को बढ़ा दिया गया और उन्हें ऊँचे-ऊँचे पोस्ट पर रखा गया. भारतीय सैनिकों की भर्ती में कमी आई. सेना में भारतीयों और अंग्रेजों का अनुपात 2:1 हो गया. विद्रोह के पहले यही अनुपात 5:1 था. तोपखानों पर सम्पूर्ण रूप से अंग्रेजी सेना का अधिकार हो गया.
विद्रोह का महत्त्व : Importance of the 1857 Revolt
1857 के विद्रोह का योगदान इस रूप में है कि इस विद्रोह ने भारत को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने और राष्ट्रीय भावना विकसित करने में मदद किया. इस विद्रोह ने भारतीयों को एकता और संघठन का पाठ पढ़ाया जो भविष्य में सभी भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना. विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन ने भारत के प्रति अपने उत्तरदायित्व को आभास किया और वह भारत की बिगड़ी स्तिथि को सुधारने के लिए अग्रसर हुआ.
सोमवार, 18 सितंबर 2017
संथाल विद्रोह 1855 – The Santhal Rebellion in Hindi
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On: सितंबर 18, 2017
संथाल समुदाय झारखण्ड-बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों के पर्वतीय इलाकों – मानभूम, बड़ाभूम, सिंहभूम, मिदनापुर, हजारीबाग, बाँकुड़ा क्षेत्र में रहते थे. कोलों के जैसे ही संथालों ने भी लगभग उन्हीं कारणों के चलते अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया. इस विद्रोह को भी अंग्रेजी सेना ने कुचल डाला. आइए जानते हैं इस विद्रोह के कारण और परिणाम को. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) का दमन किस तरह अंग्रेजों ने किया, इस विद्रोह का महत्त्व क्या है और इस विद्रोह में कौन संथालों के तरफ से आगे खड़ा (प्रमुख नेता) हुआ आदि इस पोस्ट के जरिए जानने की कोशिश करेंगे.
विद्रोह के कारण
संथालों का जीवन-यापन कृषि और वन संपदाओं पर निर्भर था. स्थायी बंदोबस्त (<<पढ़ें) के स्थापना के बाद संथालों के हाथ से खुद की जमीन भी निकल गयी. इसलिए उन्होंने अपना इलाका छोड़ दिया और राजमहल की पहाड़ियों में रहने लगे. यहाँ की जमीन को उन्होंने कृषि के योग्य बनाया, जंगल काटे और घर बनाया. संथालों के इस इलाके को “दमनीकोह” के नाम से जाना गया. सरकार की नज़र दमनीकोह पर भी पड़ी और वहाँ भी लगान वसूलने के लिए आ टपके. फिर वहाँ जमींदारी स्थापित कर दी गई. अब उस इलाके में जमींदारों, महाजनों, साहूकारों और सरकारी कर्मचारियों का वर्चस्व बढ़ने लगा. बेचारे संथालों पर लगान की राशि इतनी रखी गई कि लगान के बोझ तले वे बिखर गए. दमन का तांडव ऐसा था कि महाजन द्वारा दिए गए कर्ज पर 50 से 500% तक का सूद वसूल किया जाने लगा. वे लगान चुकाने में असमर्थ हो गये. इन सब कारणों के चलते संथाल किसानों की दरिद्रता बढ़ गयी. कर्ज न चुकाने के चलते उनके खेत, मवेशी छीन लिए गए. संथालों को जमींदारों, महाजनों का गुलाम बनना पड़ा. संथालों को कहीं से भी न्याय मिलने वाला नहीं था. सरकारी कर्मचारी, पुलिस, थानेदार आदि महाजनों का ही पक्ष लेते थे. संथालों के हित के विषय में सोचना तो दूर, इनके द्वारा संथालों का धन लूटा गया, आदिवासी स्त्रियों की इज्जत लूटी गई. संथालों को इन सब से बाहर निकालने वाला कोई नहीं था. अंततः उनके जीवन की यह निराशा एक दिन सरकार पर कहर बन कर टूट पड़ी.
विद्रोह का स्वरूप और प्रमुख नेता
1855 ई. में संथालों की क्रोध की सीमा पार कर गई. संथालों को न्याय दिलाने के लिए चार भाई सामने आये. उनके नाम थे – सि द् धू, का न्हू, चाँ द और भैरव. इन्होंने संथालों को एकजुट किया. सि द् धू ने खुद को देवदूत बतलाया ताकि संथाल समुदाय उसकी बातों पर विश्वास कर सके. संथालों के अन्दर धर्म भावना पैदा करने के लिए उसने कहा कि वह भगवान् “ठाकुर” के द्वारा भेजा गया दूत है जिन्हें वे रोज पूजते हैं. 30 जून, 1855 ई. को इन भाइयों ने सथालों की एक आमसभा बुलाई जिसमें 10,000 संथालों ने भाग लिया. इस सभा में संथालों को यह विश्वास दिलाया गया कि खुद भगवान् ठाकुर की यह इच्छा है कि जमींदारी, महाजनी और सरकारी अत्याचारों के खिलाफ संथाल सम्प्रदाय डट कर विरोध करें. अंग्रेजी शासन को समाप्त कर दिया जाए.
जुलाई 1855 ई. में सथालों ने विद्रोह का बिगुल बजाया. शुरुआत में यह आन्दोलन सरकार विरोधी आन्दोलन नहीं था पर जब संथालों ने देखा कि सरकार भी जमींदारों और महाजनों का पक्ष ले रही है तो उनका क्रोध सरकार पर भी टूट पड़ा. संथालों ने अत्याचारी दरोगा महेश लाल को मार डाला. बाजार, दुकान सब नष्ट कर दिए और थानों में आग लगा दी. कई सरकारी कार्यालयों, कर्मचारियों और महाजनों पर संथालों ने आक्रमण किया. इसके चलते कई बेक़सूर भी मारे गए. भागलपुर और राजमहल के बीच रेल, डाक, तार सेवा आदि सेवा भंग कर दी गई. संथालों ने अंग्रेजी शासन को समाप्त करने की शपथ ले ली थी. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) के आलावा हजारीबाग, बाँकुड़ा, पूर्णिया, भागलपुर, मुंगेर आदि जगहों में आग की तरह फ़ैल रही थी.
संथाल विद्रोह का दमन
ब्रिटिश सरकार संथाल की आक्रमकता देखकर अन्दर से हिल चुकी थी. सरकार ने इस इस हिंसक कार्रवाई को सख्ती से दबाने का ऐलान किया. बिहार के भागलपुर और पूर्णिया से सरकार के द्वारा घोषणापत्र जारी किया गया कि अब संथाल के विद्रोह को जल्द से जल्द कुचल दिया जाए. कलकत्ता केजार बर्रों और पूर्णिया से सेना की एक टुकड़ी संथालों का दमन करने के लिए भेजी गई. फिर उसके बाद दमन का नग्न-नृत्य शुरू हुआ. संथाल के पास अधिक शक्ति नहीं थी और पर्याप्त शस्त्र-अस्त्र भी नहीं थे. मात्र तीर और धनुष से वे कितने दिन टिकते? फिर भी उन्होंने इस दमन का दबाव बहुत बहादुरी से दिया.
अंततः कई संथालों को गिरफ्तार कर लिया गया और 15 हज़ार से अधिक संथाल सैनिकों द्वारा मार गिराए गए. संथाल के नेता भी गिरफ्तार कर लिए गए और मारे गए. अपने नेता के गिरफ्तारी से संथालों का मनोबल टूट गया और फरवरी 1856 ई. तक संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) समाप्त कर दिया गया.
संथाल विद्रोह का महत्त्व
भले ही हजारों संथालों ने अपने हक के लिए कुर्बानी दी पर उन्होंने ये साबित कर दिया कि निरीह जनता भी दमन और अत्याचार एक हद तक बर्दास्त नहीं कर सकती. सरकार को संथाल की माँगों को बाद में पूरा करने का प्रयास किया जाने लगा. कालांतर में सरकार ने संथालपरगना को जिला बनाया. फिर भी आदिवासियों पर दमन होता ही रहा. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) की प्रेरणा लेकर आदिवासियों ने आगे भी सरकार के खिलाफ कई विद्रोह किए.
शनिवार, 16 सितंबर 2017
अकबर का जीवनकाल और साम्राज्य – Akbar’s Life Story in Hindi
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On: सितंबर 16, 2017
अकबर का उत्तर भारत पर विजय
अकबर मुग़लवंश का तीसरा बादशाह था. वह अपने पिता हुमायूं की मृत्यु के बाद 1556 ई. में सिंहासन पर बैठा. उस समय उसके अधीन कोई ख़ास इलाका नहीं था. उसी वर्ष पानीपत की दूसरी लड़ाई में उसने हेमू पर विजय पाई जो अफगनों के सूर राजवंश का समर्थक था. अब वह पंजाब, दिल्ली, आगरा और पास-पड़ोस के क्षेत्र का स्वामी बन गया. अगले पाँच वर्षों में अकबर ने इस क्षेत्र में अपने राज्य को मजबूत बनाया और पूर्व में गंगा-यमुना के संगम इलाहाबाद तक और मध्य भारत में ग्वालियर और राजस्थान में अजमेर तक अपना राज्य फैलाया. अगले 20 वर्षों में अकबर ने कश्मीर, सिंध और उड़ीसा को छोड़कर पूरे उत्तर भारत को जीत लिया. 1592 ई. तक उसने इन तीनों राज्यों को भी अपने राज्य में मिला लिया. इसके पहले 1581 ई. में उसने अपने छोटे भाई हकीम की बगावत का दमन किया जिसने अपने को काबुल का स्वतंत्र सुल्तान घोषित कर दिया था. दस वर्ष बाद अकबर ने कंधार जीत लिया और बलूचिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया.
दक्षिण भारत पर विजय और अकबर की मृत्यु
उत्तर भारत को जीतने के बाद उसने दक्षिण भारत को जीतने की कोशिश की. 1600 ई. में उसने अहमदनगर पर हमला किया और 1601 ई. में खान देश के असीरगढ़ को जीत लिया. यह उसके जीवन की अंतिम विजय थी. चार साल बाद उसकी मृत्यु हुई. उस समय उसका साम्राज्य पश्चिम में काबुल से पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में हिमालय की तराई से दक्षिण में नर्मदा नदी के किनारे तक फैला था.
अकबर का साम्राज्य
अकबर का साम्राज्य 15 सूबों में बँटा था –
काबुल
लाहौर (पंजाब) जिसमें कश्मीर भी शामिल था
मुल्तान-सिंध
दिल्ली
आगरा
अवध
इलाहाबाद
अजमेर
अहमदाबाद
मालवा
बिहार
बंगाल-उड़ीसा
खानदेश
बरार और
अहमदनगर
कुशल प्रशासक
अकबर केवल एक विजेता ही नहीं था वरन् कुशल प्रशासक और साम्राज्य का संस्थापक भी था. उसने ऐसी प्रशासन व्यवस्था की जो उसके पहले के राज्यों की व्यवस्था से उच्चकोटि की थी. उसका राजतंत्र उसके व्यक्तिगत स्वेच्छाचारी शासन और नौकरशाही पर आश्रित था. उसका उद्देश्य बादशाह के व्यक्तिगत अधिकार और राजकोष को बढ़ाना था. बादशाह के हुक्म को उसके मनसबदार पूरा करते थे. मनसबदारों की 3-3 श्रेणियाँ थी, जिनके मंसब 10 से लेकर पाँच हजार तक के होते थे. इन मनसबदारों को वेतन नकद दिया जाता था. उनके ऊपर अंकुश रखने के लिए अनेक नियम बनाये गए थे, विशेष रूप से सवारों की फर्जी सूची रखने पर. हर एक सूबे में एक सूबेदार रहता था जिसको नवाब नाजिम भी कहा जाता है. वह भी अपना छोटा दरबार करता था जैसे कि तुर्क व अफगान सुलतानों के राज में होता था. लेकिन अकबर ने सूबेदारों पर अंकुश लगाया और सूबे के वित्तीय मामलों की देखभाल करने के लिए “दीवान” नामक नया अधिकारी नियुक्त किया.
राजस्व बढ़ाने के लिए राजा टोडरमल की सहायता से अकबर ने भूमि की नाप जोख और पैमाइश कराकर मालगुजारी की नयी व्यवस्था की. रैयत और काश्तकारों से लगान की वसूली की सीधी व्यवस्था चलाई गई. उपज का तिहाई हिस्सा लगान के रूप में नकद अथवा अनाज के रूप में लिया जाता था और उसकी वसूली सरकारी अफसर करते थे.
हिन्दू के प्रति उसका व्यवहार
भारत के मुसलमान शासकों में अकबर का स्थान सबसे ऊपर रखा जाता है. उसके पहले के शासकों ने यहाँ की हिन्दू प्रजा का ख्याल नहीं रखा और उनमें और बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा में लगातार संघर्ष और शत्रुता का व्यवहार चलता रहता था. अकबर ने अपने शासक के आरंभिक वर्षों में यह अनुभव किया कि हिन्दुस्तान का बादशाह केवल मुसलामानों का ही शासक नहीं होना चाहिए. यहाँ के सम्राट को यदि अपने राज्य को मजबूत बनाना है तो उसे हिन्दुओं की राजभक्ति भी प्राप्त करना चाहिए. उसे हिन्दू-मुसलमान, यह भेदभाव नहीं करना चाहिए. इसलिए उसने उदार नीति अपनाई. उसने तीर्थ-यात्राओं के ऊपर लगनेवाले जजिया कर को समाप्त कर दिया जो केवल हिन्दुओं पर लगाया जाता था. उसने हिन्दुओं को भी उनकी प्रतिभा के अनुशासित पदों पर नियुक्त किया. अकबर को राजपूतों का समर्थन मिला और उनकी वीरता के आधार पर अकबर ने अपना साम्राज्य काबुल से बंगाल तक फैलाया.
एक राजपूत सरदार जिसका नाम बीरबल था, वह अपनी इच्छा से बादशाह अकबर की सेवा में आ गया और उसका मुँह-लगा स्नेहपात्र बन गया. अकबर ने उसे “राजा” की पदवी दी. बीरबल बहादुर सेनापति होने के साथ-साथ एक प्रतिभाशाली कवि भी था. अकबर ने उसे “कविराय” की उपाधि से सम्मानित किया था. बीरबल 1586 ई. में पश्चिमोत्तर सीमा के युसूफजाई कबीले पर चढ़ाई करने के लिए मुग़ल सेना का नायक बनाकर भेजा गया और वहाँ युद्ध में मारा गया.
दीन इलाही
अकबर ने हिन्दू और इस्लाम दोनों धर्मों की अच्छी बातों को लेकर नया मत चलाने का प्रयत्न किया. इसी उद्देश्य से उसने 1582 ई. में “दीन इलाही” का प्रचलन किया. उसमें कुरान, हिन्दू धर्मशास्त्रों और बाइबिल के सिद्धांतों का समन्वय किया गया था. अकबर सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता के सिद्धांत को मानता था. उसने अपने नए धर्म को दूसरों पर लादने का प्रयास नहीं किया. दीन इलाही एकेश्वरवाद पर आधारित था किन्तु उसमें थोड़ा बहुदेववाद का भी पुट था. इसका उद्देश्य सार्वभौम धार्मिक सहिष्णुता की स्थापना करना था. भारत में, जो धार्मिक भेदभाव से बहुत पीड़ित था, इस प्रकार की सहिष्णुता एक राष्ट्रीय आवश्यकता थी. यह धर्म तर्क पर आधारित था. बहुत कम लोगों ने ही “दीन इलाही” को कबूल किया. अकबर की मृत्यु के बाद यह धर्म लुप्त हो गया.
शुक्रवार, 15 सितंबर 2017
बेसिन की संधि, 1802 का भारतीय इतिहास में महत्त्व
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On: सितंबर 15, 2017
अठारहवीं सदी के आते-आते मराठा साम्राज्य की आंतरिक एकता छिन्न-भिन्न हो गयी और विकेंद्रीकरण की शक्ति प्रबल हो गयी थी. जब मराठा संघ ऐसी बुरी स्थिति से गुजर रहा था तो वेलेजली जिया साम्राज्यवादी ईस्ट इंडिया कंपनी का गवर्नर जनरल बनकर आया. उसने आते ही मराठों के ऊपर भी अपना साम्राज्यवादी चक्र चलाना शुरू किया . जब तक नाना फड़नवीस जिन्दा रहा तब तक वह मराठों के पारस्परिक कलह और प्रतिस्पर्द्धा को रोकने में सफल रहा परन्तु उसकी मृत्यु के बाद मराठा सरदारों के बीच आपसी युद्ध शुरू हुआ. होल्कर ने सिंधिया और पेशवा की संयुक्त सेना को पूना के निकट पराजित किया. पेशवा बाजीराव द्वितीय ने बेसिन में शरण ली और 31 दिसम्बर, 1802 में सहायक संधि स्वीकार कर ली. यह समझौता बेसिन की संधि (Treaty of Bassein) के नाम से जाना जाता है.
बाजीराव II और अंग्रेजों के बीच समझौता
बेसिन की संधि (Treaty of Bassein) के अनुसार दोनों पक्षों ने संकट के समय एक-दूसरे का साथ देने का वचन दिया. पेशवा बाजीराव द्वितीय को अंग्रेजों ने 6000 सैनिक तथा तोपखाना दिए और बदले में पेशवा ने 26 लाख रु. दिए. पेशवा ने यह भी वचन दिया की बिना अंग्रेजों की स्वीकृति के वह किसी यूरोपियन को अपने यहाँ नौकरी नहीं देगा और किसी दूसरे राज्य के साथ भी युद्ध संधि या पत्र-व्यवहार नहीं करेगा. इस प्रकार बेसिन की संधि का भारतीय इतहास में एक विशिष्ट महत्त्व है क्योंकि इसके द्वारा मराठों ने अपने सम्मान और स्वतंत्रता के अंग्रेजों के हाथों बेच दिया जिससे महाराष्ट्र की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा. दूसरी ओर अंग्रेजों को पश्चिम भारत में पैर जमाने का एक अच्छा मौका मिल गया.
हालाँकि यह संधि सभी मराठी सरदारों को मंजूर नहीं था इसलिए बाद में जाकर द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध हुआ जिसके विषय में हम बाद में पढेंगे.
आर्यों की जन्मभूमि और उनका प्रसार (साक्ष्य के साथ)
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On: सितंबर 15, 2017
आर्यों (Aryans) की जन्मभूमि कहाँ पर थी, इस विषय में इतिहास के विद्वानों में बड़ा मतभेद है. आर्य (Aryans) कहाँ से आये, वे कौन थे इसका पता ठीक से अभी तक चल नहीं पाया है. कुछ विद्वानों का मत है कि वे डैन्यूब नदी के पास ऑस्ट्रिया-हंगरी के विस्तृत मैदानों में रहते थे. कुछ लोगों का विचार है कि उनका आदिम निवास-स्थान दक्षिण रूस में था. बहुत-से विद्वान ये मत रखते थे कि आर्य (Aryans) मध्य एशिया के मैदानी भागों में रहते थे. फिर वहां से वे फैले. और कुछ लोगों का यह मानना है कि आर्य (Aryans) लोग भारत के आदिम निवासी थे और यही से वे संसार के अन्य भागों में फैले.
फिर भी, अधिकांश विद्वानों का मत है कि आर्य (Aryans) लोग मध्य एशिया के मैदानी भागों में रहते थे. उनके इधर-उधर फ़ैल जाने का कारण उनका चारागाह की तलाश करना माना जाता है. आर्य (Aryans) देखने में लम्बे-चौड़े और गोरे रंग के थे. वे घुमंतू प्रवृत्ति के होते थे. उनकी भाषा लैटिन, यूनानी आदि प्राचीन यूरोपीय भाषाओं तथा आज-कल की अंग्रेजी, फ्रांसीसी, रुसी तथा जर्मन भाषाओं से मिलती-जुलती थी. अधिकांश इतिहासकारों और विद्वानों के मत से तो यही लगता है कि यूरोप और भारत के आधुनिक निवासियों के पूर्वज एक ही स्थान में रहते थे और वह स्थान मध्य-एशिया में था.
आर्यों (Aryans) के Origin के कुछ साक्ष्य
एशिया में उनका उल्लेख सर्वप्रथम एक खुदे हुए लेख में पाया जाता है जो ई.पू. 2500 के लगभग का है. घोड़ों की सौदागिरी करने के लिए वे मध्य एशिया से एशियाई कोचक में आये. यहाँ आकर कोचक और मेसोपोटामिया को जीतकर उन्होंने अपना राज्य स्थापित किया. वेवीलोनिया (जो अभी Iraq में है) के इतिहास में आर्य (Aryans) “मिटन्नी” नाम से प्रसिद्ध है. उनके राजाओं के नाम आर्यों (Aryans) के नामों से मिलते-जुलते जैसे “दुशरत्त” (दुक्षत्र) और “सुवरदत्त” (स्वर्दत्त). बोगाज-कोई (Bogl as-Koi) में पाये हुए और तेल-यल-अमर्ना (Tell-al-Amarna) के लेखों से यह सिद्ध होता है कि ये लोग भी आर्यों (Aryans) के जैसे सूर्य, वरुण, इंद्र तथा मरूत की पूजा करते थे. उनके देवताओं के “शुरियस” और “मरूत्तश ” संस्कृत के शब्द सूर्य तथा मरूत ही है. ज्ञात होता है कि ई.पू. 1500 के लगभग मेसोपोटामिया की सभ्यता को नष्ट करनेवाले लोग उन्हीं आर्य Aryans के पूर्वज थे जिन्होंने भारत के द्रविड़ों को हराया और वेदों की रचना की.
आर्यों (Aryans)की एक दूसरी शाखा भी थी जो फारस के उपजाऊ मैदानों में पाई जाती थी. उन्हें इंडो-ईरानियन कहा जाता था. पहले इन दोनों दलों के बीच कोई स्पष्ट अंतर नहीं दिखता था. जैसे वे एक ही देवताओं को पूजते थे, पूजा-पाठ का ढंग भी एक ही था. कालांतर में इरानी दल बदल गया. उनके नामों में भी जो समानता थी, वे भी धीरे-धीरे नहीं रही. ई.पू. छठी शताब्दी के पहले ही उन्होंने अपना धर्म बदल डाला और सूर्य और अग्नि के उपासक बन गए.
आर्य लोगों (Aryans) का बाहर जाना
आर्य (Aryans) लोग अपनी जन्मभूमि को छोड़कर ऐसी जगह गए जहाँ कुछ लोग पहले से निवास करते थे. ऐसी दशा में उन्हें पहले से निवास कर रहे लोगों से लड़ना पड़ा. आर्य (Aryans) लोग अपने जन्म-स्थान से कभी-भी बड़ी संख्या में नहीं निकलते थे. वे टुकड़ों में बँट के ही इधर-उधर जाते थे. पर जहाँ भी जाते थे, उनका द्वंद्व पहले से रह रहे लोगों से होता था. कहीं-कहीं जो अनार्य थे उन्होंने आर्यों (Aryans) की भाषा को तो अपनाया ही, साथ-साथ उन्हीं के देवी-देवताओं को भी पूजने लगे. पर अधिकांश जगह यही हुआ कि आर्यों (Aryans) ने उनकी जमीन और संपत्ति छीन कर उन्हें अपनी प्रजा में शामिल कर लिया. आर्यों (Aryans) के बाहर निकलने का समय ठीक तौर पर निश्चित नहीं किया जा सकता परन्तु विद्वानों का अनुमान है कि यह घटना 3000 ई.पू. से पहले की नहीं है.
गुरुवार, 14 सितंबर 2017
तीनों पानीपत युद्धों का संक्षिप्त विवरण – War of Panipat in Hindi
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On: सितंबर 14, 2017
आज इस पोस्ट में हम पानीपत की पहली, दूसरी और तीसरी लड़ाई (Panipat First, Second and Third War) की कहानी आपके सामने रखेंगे. इन युद्धों के क्या कारण थे, ये युद्ध किनके बीच हुआ और इन युद्धों के क्या परिणाम निकले, इन सब तथ्यों की चर्चा करेंगे. भारतीय इतिहास में ये तीनों युद्ध बहुत महत्त्वपूर्ण हैं. पेश है आपके सामने तीनों पानीपत युद्धों का संक्षिप्त विवरण. पेश है आपके सामने पानीपत के तीनों युद्धों का संक्षिप्त विवरण Hindi में.
पानीपत की प्रथम लड़ाई – First Panipat War
पानीपत में तीन भाग्यनिर्णायक लडाईयाँ यहाँ हुई, जिन्होंने भारतीय इतिहास की धारा ही मोड़ दी. पानीपत की पहली लड़ाई -Panipat War 1 21 अप्रैल, 1526 ई. को दिल्ली के सुलतान इब्राहीम लोदी और मुग़ल आक्रमणकारी बाबर के बीच हुई. इब्राहीम के पास एक लाख संख्या तक की फ़ौज थी. उधर बाबर के पास मात्र 12,000 फ़ौज तथा बड़ी संख्या में तोपें थीं. रणविद्या, सैन्य-सञ्चालन की श्रेष्ठता और विशेषकर तोपों के नए और प्रभावशाली प्रयोग के कारण बाबर ने इब्राहीम लोदी के ऊपर निर्णयात्मक विजय प्राप्त की. लोदी ने रणभूमि में ही प्राण त्याग दिया. पानीपत की पहली लड़ाई के फलस्वरूप दिल्ली और आगरा पर बाबर का दखल हो गया और उससे भारत में मुग़ल राजवंश का प्रचालन हुआ.
पानीपत की दूसरी लड़ाई – Second Panipat War
पानीपत की दूसरी लड़ाई -Panipat War 2 ( 5 नवम्बर, 1556 ई. को अफगान बादशाह आदिलशाह सूर के योग्य हिन्दू सेनापति और मंत्री हेमू और अकबर के बीच हुई, जिसने अपने पिता हुमायूँ से दिल्ली का तख़्त पाया था. हेमू के पास अकबर से कहीं अधिक बड़ी सेना थी. उसके पास 1500 हाथी भी थे. प्रारम्भ में मुग़ल सेना के मुकाबले में हेमू को सफलता प्राप्त हुई परन्तु संयोगवश एक तीर हेमू के आँख में घुस गया और यह घटना युद्ध में जीत रहे हेमू के हार का कारण बन गई. तीर लगने से हेमू अचेत होकर गिर पड़ा और उसकी सेना भाग खड़ी हुई. हेमू को गिरफ्तार कर लिया गया और उसे किशोर अकबर के सामने ले जाया गया. अकबर ने उसका सर धड़ से अलग कर दिया. पानीपत की दूसरी लड़ाई के फलस्वरूप दिल्ली और आगरा अकबर के कब्जे में आ गए. इस लड़ाई के फलस्वरूप दिल्ली के तख़्त के लिए मुगलों और अफगानों के बीच चलनेवाला संघर्ष अंतिम रूप से मुगलों के पक्ष में निर्णीत हो गया और अगले तीन सौ वर्षों तक दिल्ली का तख़्त मुगलों के पास रहा.
पानीपत की तीसरी लड़ाई – Third Panipat War
पानीपत की तीसरी लड़ाई -Panipat War 3 ने भारत का भाग्य निर्णय कर दिया जो उस समय अधर में लटक रहा था. पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 ई. में हुआ. अफगान का रहने वाला अहमद अब्दाली वहाँ का नया-नया बादशाह बना था. अफगानिस्तान पर अधिकार जमाने के बाद उसने हिन्दुस्तान पर भी कई बार चढ़ाई की और दिल्ली के दरबार की निर्बलता और अमीरों के पारस्परिक वैमनस्य के कारण अहमद अब्दाली को किसी प्रकार की रुकावट का सामना नहीं करना पड़ा. पंजाब के सूबेदार की पराजय के बाद भयभीत दिल्ली-सम्राट ने पंजाब को अफगान के हवाले कर दिया. जीते हुए देश पर अपना सूबेदार नियुक्त कर अब्दाली अपने देश को लौट गया. उसकी अनुपस्थिति में मराठों ने पंजाब पर धावा बोलकर, अब्दाली के सूबेदार को बाहर कर दिया और लाहौर पर अधिकार जमा लिया. इस समाचार को सुनकर अब्दाली क्रोधित हो गया और बड़ी सेना ले कर मराठों को पराजित करने के लिए अफगानिस्तान से रवाना हुआ. मराठों ने भी एक बड़ी सेना एकत्र की, जिसका अध्यक्ष सदाशिवराव और सहायक अध्यक्ष पेशवा का बेटा विश्वासराव था. दोनों वीर अनेक मराठा सेनापतियों तथा पैदल-सेना, घोड़े, हाथी के साथ पूना से रवाना हुए. होल्कर, सिंधिया, गायकवाड़ और अन्य मराठा-सरदारों ने भी उनकी सहायता की. राजपूतों ने भी मदद भेजी और 30 हजार सिपाही लेकर भरतपुर (राजस्थान) का जाट-सरदार सूरजमल भी उनसे आ मिला. मराठा-दल में सरदारों की एक राय न होने के कारण, अब्दाली की सेना पर फ़ौरन आक्रमण न हो सका. पहले हमले में तो मराठों को विजय मिला पर विश्वासराव मारा गया. इसके बाद जो भयंकर युद्ध हुआ उसमें सदाशिवराव मारा गया. मराठों का साहस भंग हो गया. पानीपत की पराजय तथा पेशवा की मृत्यु से सारा महाराष्ट्र निराशा के अन्धकार में डूब गया और उत्तरी भारत से मराठों का प्रभुत्व उठ गया.
बुधवार, 13 सितंबर 2017
आज़ाद हिन्द फ़ौज : Indian National Army in Hindi
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On: सितंबर 13, 2017
आज इस आलेख (essay) में हम आजाद हिन्द फ़ौज की चर्चा करने वाले हैं. यह फ़ौज कितना सफल हुआ और कितना असफल, आज हम इन सब की चर्चा करेंगे. यह सेना किसके द्वारा और क्यों बनाई गई, इस article में हम सब जानेंगे. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान रूस और जर्मनी में युद्ध छिड़ गया और सुदूर पूर्व में जापानी साम्राज्यवाद अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया. 15 फरवरी, 1942 ई. को जापानियों ने सिंगापुर पर अधिकार कर लिया. इन परिस्थतियों के बीच 28 मार्च, 1942 ई. को रास बिहारी बोस ने टोक्यो में एक सम्मलेन को आहूत किया. इसमें यह निर्णय लिया गया कि भारतीय अफसरों के अधीन एक भारतीय राष्ट्रीय सेना (Indian National Army) संगठित की जाए. 23 जून, 1942 ई. को बर्मा, मलाया, थाईलैंड, हिन्दचीन, फिलीपिन्स, जापान, चीन, हांगकांग और इंडोनेशिया के प्रतिनिधियों का एक सम्मलेन रास बिहारी की अध्यक्षता में Bangkok में सम्पन्न हुआ.
इसी दौरान जापानियों ने उत्तरी मलाया में ब्रिटेन की सेना को हरा दिया. वहाँ पहले भारतीय बटालियन के कप्तान मोहन सिंह और उनके सैनिकों को आत्मसमर्पण करना पड़ा. जापानियों के सुझाव से वे भारत की स्वतंत्रता के लिए जापानियों के साथ सहयोग करने को तैयार हुए. सिंगापुर के 40,000 भारतीय युद्धबंदी मोहन सिंह को दे दिए गए. मोहन सिंह चाहते थे कि आजाद हिन्द फ़ौज की स्वतंत्र कार्रवाई के लिए उन्हें स्वतंत्र रखा जाए पर जापानी इसके लिए तैयार नहीं थे. एक बार इसी मामले को लेकर जापानियों ने मोहन सिंह को गिरफ्तार भी कर लिया था पर बाद में रिहा भी कर दिया गया था.
सुभाष चन्द्र बोस
फरवरी, 1943 ई. में सुभाष चन्द्र बोस एक जापानी पनडुब्बी के सहयोग से टोक्यो, जापान पहुँचे और उनका वहाँ भव्य स्वागत हुआ. सिंगापुर में रास बिहारी बोस ने आजाद हिन्द फ़ौज का नेतृत्व बोस के हाँथो सौंप दिया. सुभाष चन्द्र बोस ने “दिल्ली चलो” का नारा दिया. उन्होंने आजाद हिन्द फ़ौज को लेकर हिन्दुस्तान जाने की घोषणा की. आजाद हिन्द फ़ौज को एक अस्थायी सरकार के रूप में माना गया जिसको जापान ने मान्यता भी दे दी. 31 दिसम्बर, 1943 ई. को जापान द्वारा जीता गया अंडमान निकोबार आजाद हिन्द फ़ौज के हाथो सुपुर्द कर कर दिया गया दिया गया. अंडमान का नाम बदलकर शहीद और निकोबार का नाम बदलकर स्वराज रख दिया गया.
आजाद हिन्द फ़ौज की जीत और फिर हार
जनवरी, 1944 ई. में आजाद हिन्द फ़ौज के कुछ दस्ते रंगून (Myanmar) पहुँचे. सुभाष चन्द्र बोस ने सेना की कुछ टुकड़ी रंगून में ही रहने दी और फिर शेष सेना के साथ आगे बढ़ने का फैसला लिया. मई, 1944 ई. तक आजाद हिन्द फ़ौज के कुछ सैनिक कोहिमा (नागालैंड) तक जा पहुँचे. यहाँ मिली जीत के बाद वहाँ भारतीय तिरंगा झंडा फहराया गया. ब्रिटिश सेना आजाद हिन्द फ़ौज के इस जीत से सख्ते में थी. पर उन्होंने जोर-शोर से आजाद हिन्द फ़ौज के खिलाफ कार्रवाई की और भारी सैनिक बल के साथ हमला बोला. आजाद हिन्द फ़ौज को जरुरत के समय जापानियों का सहयोग नहीं मिला और आजाद हिन्द फ़ौज की स्थिति चरमरा गयी. इसका लाभ उठाकर 1944 ई. के बीच अंग्रेजों ने फिर से रंगून पर कब्ज़ा कर लिया.
विश्लेषण
यह जरुर है कि आजाद हिन्द फ़ौज के सैनिक देश प्रेम की भावना से ओत-प्रोत थे पर वे अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सके. इसके पीछे अंतर्राष्ट्रीय परिस्थतियाँ जिम्मेदार थीं. जापान ने प्रारंभ से ही आजाद हिन्द फ़ौज को स्वतंत्र रूप से काम करने नहीं दिया. धन की कमी तो थी ही, आजाद हिंदी फ़ौज के सैनिकों के पास अच्छे हथियार भी नहीं थे. फिर भी इस फ़ौज के प्रयासों का प्रभाव पूरे देश पर पड़ा और देशप्रेम की लहर पूरे भारतवर्ष पर दौड़ पड़ी.
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