मंगलवार, 12 सितंबर 2017
प्रथम विश्वयुद्ध – First World War [1914-18]
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On: सितंबर 12, 2017
प्रथम विश्वयुद्ध की भूमिका (Background of First World War)
1914-18 ई. का प्रथम विश्वयुद्ध (First World War) साम्राज्यवादी राष्ट्रों की पारस्परिक प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम था. प्रथम विश्वयुद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण गुप्त संधि प्रणाली थी. यूरोप में गुप्त संधि की प्रथा जर्मन चांसलर बिस्मार्क ने शुरू की थी. इसने यूरोप को दो विरोधी गुटों में विभाजित कर दिया. दो गुटों के बीच एक-दूसरे के प्रति संदेह और घृणा का भाव बढ़ता गया. राजनीतिक वातावरण दूषित हो गया. 1879 ई. में जर्मनी ने ऑस्ट्रिया-हंगरी (Austria-Hungary) के साथ गुप्त संधि की. 1882 ई. में इटली भी इस गुट में शामिल हो गया. इस प्रकार त्रिगुट का निर्माण हुआ. 1887 ई. में जर्मनी और रूस दोनों मिल गए. विश्व राजनैतिक अखाड़े में फ्रांस अकेला पड़ गया. फ्रांस को अपमानित करने के लिए ही जर्मनी ने इन देशों के साथ संधि की थी. फ्रांस प्रतिशोध की आग में अन्दर ही अन्दर जल रहा था. इसलिए 1894 ई. में फ्रांस ने रूस से संधि की. उधर इंग्लैंड ने 1902 ई. में जापान के साथ, 1904 ई. में फ्रांस और 1907 ई. में रूस के साथ संधि कर ली. इस प्रकार दो राजनीतिक खेमों में बँटा यूरोप युद्ध का अखाड़ा हो गया.
एक ओर इंग्लैंड, फ्रांस, रूस और जापान का त्रिगुट था और दूसरा गुट जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी, इटली और तुर्की का था. दोनों के बीच हथियारबंदी की होड़ चल रही थी.
1912-13 ई. के बाल्कन युद्धों (War in the Balkans) ने तो प्रथम विश्वयुद्ध को अनिवार्य बना दिया. यूरोप के अनेक राष्ट्र बाल्कन क्षेत्र में अपने साम्राज्य के विस्तार का प्रयास कर रहे थे. ऑस्ट्रिया और रूस भी इसी क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहते थे. बाल्कन क्षेत्र में साम्राज्यवादी प्रतिद्वंदिता ने विश्वयुद्ध की भूमिका तैयार की.
गुप्त संधियों के अलावे प्रथम विश्व युद्ध के अनेक कारण गिनाये जा सकते हैं –
Causes of World War I
1. उग्र राष्ट्रीयता (Furious Nationality)
उग्र राष्ट्रीयता के कारण भी प्रथम विश्वयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई थी. बड़े एवं शक्तिशाली राष्ट्रों के अतिरिक्त यूनान और सर्बिया जैसे छोटे-छोटे देशों पर भी उग्र राष्ट्रीयता का नशा चढ़ा हुआ था. वे वृहत्तर यूनान, वृहत्तर बुल्गेरिया और वृहत्तर सर्बिया की मांग कर रहे थे. चेक, स्लाव जातियाँ अपनी राष्ट्रीय आकांक्षा को पूरा करने के लिए यूरोप में अशांति उत्पन्न कर रही थीं. जब यूरोप के साम्राज्यवादी राष्ट्र अपनी सभ्यता-संस्कृति और धर्म का पाठ पढ़ाने के लिए संसार में आगे बढ़े तो उनमें संघर्ष अनिवार्य हो गया.
2. आर्थिक प्रतिद्वंदिता (Economic Rivalry)
औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप यूरोप के राष्ट्रों के आर्थिक जीवन में महान् परिवर्तन हुआ. पूंजीवाद की उत्पत्ति हुई. पूँजीवादी अतिरिक्त पूँजी लगाने के लिए उपनिवेश की माँग करने लगे. बढ़ती हुई जनसंख्या को बसाने के लिए भी उपनिवेश की आवाश्यकता थी. इस समस्या का समाधान साम्राज्य-विस्तार से ही संभव था. इसलिए उपनिवेश को लेकर ही संघर्ष प्रारम्भ हुआ. पूँजीवादी राष्ट्रों के बीच आर्थिक महत्त्वाकांक्षा के कारण घृणा और अविश्वास का वातावरण तैयार हो गया.
3. साम्राज्यवादी होड़ (Imperialist Competition)
साम्राज्यवादी होड़ प्रथम विश्वयुद्ध का एक आधारभूत कारण था. औद्योगिक क्रान्ति के कारण यूरोपीय देशों के सामने व्यावसायिक माल की खपत और कल-कारखानों को चलाने के लिए कच्चे माल की प्राप्ति की समस्या उत्पन्न हुई. इस समस्या का समाधान साम्राज्य-विस्तार में दिखाई दिया. इसलिए इंग्लैंड, फ्रांस, हॉलैंड, बेल्जियम, पुर्तगाल, डेनमार्क, इटली अपना साम्राज्य बढ़ाने का प्रयत्न करने लगे. इससे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विता बढ़ी. अफ्रीका और चीन इस प्रतिद्वंद्विता का शिकार पहले हुए. सूडान को लेकर इंग्लैंड और फ्रांस के बीच युद्ध छिड़ते-छिड़ते बचा.
4. सैन्यवाद और शस्त्रीकरण (Militarism and Armament)
उग्र राष्ट्रीयता और साम्राज्यवादी मनोवृत्ति ने यूरोप के राष्ट्रों का ध्यान सैन्यवाद और शस्त्रीकरण की ओर खींचा. फ्रांस, जर्मनी आदि साम्राज्यवादी राष्ट्र अपनी आमदनी का 85% सैनिक तैयारी पर खर्च करने लगे. भय तथा संदेह ने प्रत्येक राष्ट्र को युद्ध-सामग्री जमा करने के लिए उत्प्रेरित किया और इस तरह प्रत्येक देश युद्ध के लिए तैयार हो गया.
5. समाचारपत्रों का झूठा प्रचार (Newspapers’ False Propaganda)
प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व सभी देशों के समाचारपत्र एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे थे. इससे एक-दूसरे की राष्ट्रीय भावना को ठेस लग रही थी. कभी-कभी दो राष्ट्रों के बीच विवादास्पद प्रश्न पर समाचारपत्रों में इस तरह की आलोचना की जाती थी कि जनता पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता था.
6. फ्रांस की बदले की भावना (France’s Revenge Spirit)
जर्मनी का एकीकरण फ्रांस को पराजित कर के पूरा किया गया था. फ्रांस को अल्सस-लारेन का प्रदेश खोना पड़ा था. फ्रांस राष्ट्रीय अपमान को भूला नहीं था और वह जर्मनी से बदला लेना चाहता था. जर्मनी मोरक्को में फ्रांस का विरोध कर रहा था. इससे दोनों में मनमुटाव पैदा हुआ.
7. अंतर्राष्ट्रीय अराजकता (International Anarchy)
इस समय यूरोप में एक प्रकार से अंतर्राष्ट्रीय अराजकता फ़ैल चुकी थी. प्रत्येक राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा था. अपने हितों की रक्षा के लिए कोई भी देश अपने विरोधी के साथ संधि कर सकता था. स्वार्थी राष्ट्र की इस नीति ने विरोधाभास को जन्म दिया. इस परिस्थिति को रोकने के लिए कोई अंतर्राष्ट्रीय संस्था नहीं थी जिसके अभाव के कारण सभी राष्ट्र मनमानी कर रहे थे.
8. सराजेवो हत्याकांड (Sarajevo Assassination)
युद्ध का तात्कालिक कारण ऑस्ट्रिया (Austria) के राजकुमार आर्कड्यूक फ्रान्ज़ (Archduke Franz) की हत्या थी. राजकुमार की हत्या बोस्निया (Bosnia) की राजधानी सराजेवो (Sarajevo) में हुई थी. ऑस्ट्रिया की सरकार ने राजकुमार की हत्या के लिए सर्बिया को उत्तरदाई ठहराया और उसके समक्ष 12 कड़ी शर्तें रखीं. सर्बिया की सरकार ने सभी शर्तों को मानने में अपनी असमर्थता प्रकट की. सर्बिया की सरकार समस्या का समाधान महाशक्तियों के सम्मलेन द्वारा करना चाहती थी. किन्तु ऑस्ट्रिया के राजनीतिज्ञों और सैनिक पदाधिकारियों ने सर्बिया की प्रार्थना पर ध्यान नहीं दिया. ऑस्ट्रिया की सरकार ने 28 जुलाई, 1914 ई. को युद्ध की घोषणा कर अपनी सेना को सर्बिया पर आक्रमण करने का आदेश दिया. इस घटना से ही प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई. युद्ध की समाप्ति 11 नवम्बर, 1918 को हुई.
सोमवार, 11 सितंबर 2017
[विश्व इतिहास] फ्रांस की क्रांति – 1789 French Revolution
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On: सितंबर 11, 2017
फ्रांस की क्रांति (French Revolution): भूमिका
18वीं शताब्दी के 70-80 के दशकों में विभिन्न कारणों से राजा और तत्कालीन राजव्यवस्था के प्रति फ्रांस के नागरिकों में विद्रोह की भावना पनप रही थी. यह विरोध धीरे-धीरे तीव्र होता चला गया. अंततोगत्वा 1789 में राजा लुई 16वाँ (Louis XVI) को एक सभा बुलानी पड़ी. इस सभा का नाम General State था. यह सभा कई वर्षों से बुलाई नहीं गयी थी. इसमें सामंतों के अतिरिक्त सामान्य वर्ग के भी प्रतिनिधि होते थे. इस सभा में जनता की माँगों पर जोरदार बहस हुई. स्पष्ट हो गया कि लोगों में व्यवस्था की बदलने की बैचैनी थी. इसी बैचैनी का यह परिणाम हुआ कि इस सभा के आयोजन के कुछ ही दिनों के बाद सामान्य नागरिकों का एक जुलूस बास्तिल नामक जेल पहुँच गया और उसके दरवाजे तोड़ डाले गए. सभी कैदी बाहर निकल गए. सच पूंछे तो नागरिक इस जेल को जनता के दमन का प्रतीक मानते थे. कुछ दिनों के बाद महिलाओं का एक दल राजा के वर्साय स्थित दरबार को घेरने निकल गया जिसके फलस्वरूप राजा को पेरिस चले जाना पड़ा. इसी बीच General State ने कई क्रांतिकारी कदम भी उठाना शुरू किए. यथा – मानव के अधिकारों की घोषणा, मेट्रिक प्रणाली का आरम्भ, चर्च के प्रभाव का समापन, सामंतवाद की समाप्ति की घोषणा, दास प्रथा के अंत की घोषणा आदि. General State के सदस्यों में मतभेद भी हुए. कुछ लोग क्रांति के गति को धीमी रखना चाहते थे. कुछ अन्य प्रखर क्रान्ति के पोषक थे. इन लोगों में आपसी झगड़े भी होने लगे पर इनका नेतृत्व कट्टर क्रांतिकारियों के हाथ में रहा. बाद में इनके एक नेता Maximilian Robespierre हुआ जिसने हज़ारों को मौत के घाट उतार दिया. उसके एक वर्ष के नेतृत्व को आज भी आतंक का राज (Reign of terror) कहते हैं. इसकी परिणति स्वयं Louis 16th और उसकी रानी की हत्या से हुई. राजपरिवार के हत्या के पश्चात् यूरोप के अन्य राजाओं में क्रोध उत्पन्न हुआ और वे लोग संयुक्त सेना बना-बना कर क्रांतिकारियों के विरुद्ध लड़ने लगे. क्रांतिकारियों ने भी एक सेना बना ली जिसमें सामान्य वर्ग के लोग भी सम्मिलित हुए. क्रान्ति के नए-नए उत्साह के कारण क्रांतिकारियों की सेना बार-बार सफल हुई और उसका उत्साह बढ़ता चला गया. यह सेना फ्रांस के बाहर भी भूमि जीतने लगी. इसी बीच इस सेना का एक सेनापति जिसका नाम नेपोलियन बोनापार्ट था, अपनी विजयों के कारण बहुत लोकप्रिय हुआ. इधर फ्रांस के अन्दर कट्टर क्रांति से लोग ऊब चुके थे. इसका लाभ उठाते हुए और अपनी लोकप्रियता को भुनाते हुए नेपोलियन ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया और एक Consulate बना कर शासन चालने लगा. यह शासन क्रांतिकारी सिद्धांतों पर चलता रहा. अंततः नेपोलियन ने सम्राट की उपाधि अपने आप को प्रदान की और इस प्रकार फ्रांसमें राजतंत्र दुबारा लौट आया. इस प्रकार हम कह सकते हैं फ्रांस की क्रांति (French Revolution) अपनी चरम अवस्था में थी.
1789 ई. की फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution) आधुनिक युग की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी. यह क्रांति (French Revolution) निरंकुश राजतंत्र, सामंती शोषण, वर्गीय विशेषाधिकार तथा प्रजा की भलाई के प्रति शासकों की उदासीनता के विरुद्ध प्रारंभ हुई थी. उस समय फ्रांस में न केवल शोषित और असंतुष्ट वर्ग की विद्दमान थे, बल्कि वहाँ के आर्थिक और राजनैतिक ढाँचा में भी विरोधाभास देखा जा सकता था. राजनैतिक शक्ति का केन्द्रीकरण हो चुका था. सम्पूर्ण देश की धुरी एकमात्र राज्य था. समाज का नेतृत्व शनैः शनैः बुद्धिजीवी वर्ग के हाथ में आ रहा था. राजा शासन का सर्वोच्च अधिकारी होता था. राजा की इच्छाएँ ही राज्य का कानून था. लोगों को किसी प्रकार का नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं था. राजा के अन्यायों और अत्याचारों से आम जनता परेशान थी. भाषण, लेखन और प्रकाशन पर कड़ा प्रतिबंध लगा हुआ था. लोगों को धार्मिक स्वंतत्रता भी नहीं दी गयी थी. राष्ट्र की सम्पूर्ण आय पर राजा का निजी अधिकार था. सम्पूर्ण आमदनी राजा-रानी और दरबारियों के भोग-विलास तथा आमोद-प्रमोद पर खर्च हो जाता था. राज्य के उच्च पदों पर राजा के कृपापात्रों की नियुक्ति होती थी. स्थानीय स्वशासन का अभाव था. फ्रांसीसी समाज दो टुकड़ों में बँट कर रह गया था – एक सुविधा-प्राप्त वर्ग और दूसरा सुविधाहीन वर्ग.
फ्रांस की क्रांति (French Revolution) का प्रभाव विश्वव्यापी हुआ. इसके फलस्वरूप निरंकुश शासन तथा सामंती व्यवस्था का अंत हुआ. प्रजातंत्रात्मक शासन-प्रणाली की नींव डाली गई. सामजिक, आर्थिक और धार्मिक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण सुधार लाये गए.
राजनैतिक कारण
i) निरंकुश राजतंत्र
राजतंत्र की निरंकुशता फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution) का एक प्रमुख कारण था. राजा शासन का सर्वोच्च अधिकारी होता था. वह अपनी इच्छानुसार काम करता था. वह अपने को ईश्वर का प्रतिनिधि बतलाता था. राजा के कार्यों के आलोचकों को बिना कारण बताए जेल में डाल दिया जाता था. राजा के अन्यायों और अत्याचारों से आम जनता तबाह थी. वह निरंकुश से छुटकारा पाने के लिए कोशिश करने लगी.
ii) स्वतंत्रताओं का अभाव
फ्रान्स में शासन का अति केन्द्रीकरण था. शासन के सभी सूत्र राजा के हाथों में थे. भाषण, लेखन और प्रकाशन पर कड़ा प्रतिबंध लगा हुआ था. राजनैतिक स्वतंत्रता का पूर्ण अभाव था. लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता भी नहीं थी. बंदी प्रत्यक्षीकरण नियम की व्यवस्था नहीं थी. न्याय और स्वतंत्रता की इस नग्न अवहेलना के कारण लोगों का रोष धीरे-धीरे क्रांति का रूप ले रहा था.
iii) राजप्रसाद का विलासी जीवन और धन का अपव्यय
राष्ट्र की सम्पूर्ण आय पर राजा का निजी अधिकार था. सम्पूर्ण आमदनी राजा-रानी और दरबारियों के भोग-विलास तथा आमोद-प्रमोद पर खर्च हुआ होता था. रानी बहुमूल्य वस्तुएँ खरीदने में अपार धन खर्च करती थी. एक ओर किसानों, श्रमिकों को भरपेट भोजन नहीं मिलता था तो दूसरी ओर सामंत, कुलीन और राजपरिवार के सदस्य विलासिता का जीवन बिताते थे.
iv) प्रशासनिक अव्यवस्था
फ्रान्स का शासन बेढंगा और अव्यवस्थित था. सरकारी पदों पर नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं होती थी. राजा के कृपापात्रों की नियुक्ति राज्य के उच्च पदों पर होती थी. भिन्न-भिन्न प्रान्तों में अलग-अलग कानून थे. कानून की विविधता के चलते स्वच्छ न्याय की आशा करना बेकार था.
सामजिक कारण
i) पादरी वर्ग
फ्रांसमें रोमन कैथोलिक चर्च की प्रधानता थी. चर्च एक स्वतंत्र संस्था के रूप में काम कर रहा था. इसका अपना अलग संगठन था, अपना न्यायालय था और धन प्राप्ति का स्रोत था. देश की भूमि का पाँचवा भाग चर्च के पास था. चर्च की वार्षिक आमदनी करीब तीस करोड़ रुपये थी. चर्च स्वयं करमुक्त था, लेकिन उसे लोगों पर कर लगाने का विशेष अधिकार प्राप्त था. चर्च की अपार संपत्ति से बड़े-बड़े पादरी भोग-विलास का जीवन बिताते थे. धर्म के कार्यों से उन्हें कोई मतलब नहीं था. वे पूर्णतया सांसारिक जीवन व्यतीत करते थे.
ii) कुलीन वर्ग
फ्रांसका कुलीन वर्ग सुविधायुक्त एवं सम्पन्न वर्ग था. कुलीनों को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे. वे राजकीय कर से मुक्त थे. राज्य, धर्म और सेना के उच्च पदों पर कुलीनों की नियुक्ति होती थी. वे किसानों से कर वसूल करते थे. वे वर्साय के राजमहल में जमे रहते और राजा को अपने प्रभाव में बनाए रखने की पूरी कोशिश करते थे. कुलीनों के विशेषाधिकार और उत्पीड़न ने साधारण लोगों को क्रांतिकारी बनाया था.
iii) कृषक वर्ग
किसानों का वर्ग सबसे अधिक शोषित और पीड़ित था. उन्हें कर का बोझ उठाना पड़ता था. उन्हें राज्य, चर्च और जमींदारों को अनेक प्रकार के कर देने पड़ते थे. कृषक वर्ग अपनी दशा में सुधार लान चाहते थे और यह सुधार सिर्फ एक क्रांति द्वारा ही आ सकती थी.
iv) मजदूर वर्ग
मजदूरों और कारीगरों की दशा अत्यंत दयनीय थी. औद्योगिक क्रान्ति के कारण घरेलू उद्योग-धंधों का विनाश हो चुका था और मजदूर वर्ग बेरोजगार हो गए थे. देहात के मजदूर रोजगार की तलाश में पेरिस भाग रहे थे. क्रांति के समय (French Revolution) मजदूर वर्ग का एक बड़ा गिरोह तैयार हो चुका था.
v) मध्यम वर्ग
माध्यम वर्ग के लोग सामजिक असमानता को समाप्त करना चाहते थे. चूँकि तत्कालीन शासन के प्रति सबसे अधिक असंतोष मध्यम वर्ग में था, इसलिए क्रांति (French Revolution) का संचालन और नेतृत्व इसी वर्ग ने किया.
आर्थिक कारण
विदेशी युद्ध और राजमहल के अपव्यय के कारण फ्रांस की आर्थिक स्थिति लचर हो गयी थी. आय से अधिक व्यय हो चुका था. खर्च पूरा करने के लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ रहा था. कर की असंतोषजनक व्यवस्था के साथ-साथ शासकों की फिजूलखर्ची से फ्रांसकी हालत और भी ख़राब हो गई थी.
बौधिक जागरण
विचारकों और दार्शनिकों ने फ्रांसकी राजनैतिक एवं सामाजिक बुराइयों की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया और तत्कालीन व्यवस्था के प्रति असंतोष, घृणा और विद्रोह की भावना को उभरा. Montesquieu, Voltaire, Jean-Jacques Rousseau के विचारों से मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित था. Montesquieu ने समाज और शासन-व्यवस्था की प्रसंशा Power-Separation Theory का प्रतिपादन किया. वाल्टेयर ने सामाजिक एवं धार्मिक कुप्रथाओं पर प्रहार किया. रूसो ने राजतंत्र का विरोध किया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बल दिया. उसने जनता की सार्वभौमिकता के सिद्धांत (Principles of Rational and Just Civic Association) का प्रतिपादन किया. इन लेखकों ने लोगों को मानसिक रूप से क्रान्ति के लिए तैयार किया.
सैनिकों में असंतोष
फ्रांस की सेना भी तत्कालीन शासन-व्यवस्था से असंतुष्ट थी. सेना में असंतोष फैलते ही शासन का पतन अवश्यम्भावी हो जाता है. सैनिकों को समय पर वेतन नहीं मिलता था. उनके खाने-पीने तथा रहने की उचित व्यवस्था नहीं थी. उन्हें युद्ध के समय पुराने अस्त्र-शस्त्र दिए जाते थे. ऐसी स्थिति में सेना में रोष का उत्पन्न होना स्वाभाविक था.
फ्रांसीसी क्रांति के परिणाम
निरंकुश शासन का अंत कर प्रजातंत्रात्मक शासन-प्रणाली की नींव डाली गई. प्रशासन के साथ-साथ सामजिक, धार्मिक एवं आर्थिक जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए. फ्रांस की क्रांति (French Revolution) ने निरंकुश शासन का अंत कर लोकप्रिय संप्रभुता के सिद्धांत को प्रतिपादित किया. क्रांति के पूर्व फ्रांसऔर अन्य यूरोपीय देशों के शासक निरंकुश थे. उनपर किसी प्रकार का वैधानिक अंकुश नहीं था. क्रांति ने राजा के विशेषाधिकारों और दैवी अधिकार सिद्धांत पर आघात किया. इस क्रांति के फलस्वरूप सामंती प्रथा (Feudal System) का अंत हो गया. कुलीनों के विदेषाधिकार समाप्त कर दिए गए. किसानों को सामंती कर से मुक्त कर दिया गया. कुलीनों और पादरियों के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गये. लोगों को भाषण-लेखन तथा विचार-अभीव्यक्ति का अधिकार दिया गया. फ्रांस की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए कर-प्रणाली (tax system) में सुधार लाया गया. कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका को एक-दूसरे से पृथक् कर दिया गया. अब राजा को संसद के परामर्श से काम करना पड़ता था. न्याय को सुलभ बनाने के लिए न्यायालय का पुनर्गठन किया गया. सरकार के द्वारा सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था की गई. फ्रांसमें एक एक प्रकार की शासन-व्यवस्था स्थापित की गई, एक प्रकार के आर्थिक नियम बने और नाप-तौल की नयी व्यवस्था चालू की गई. लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता मिली. उन्हें किसी भी धर्म के पालन और प्रचार का अधिकार मिला. पादरियों को संविधान के प्रति वफादारी की शपथ लेनी पड़ती थी. French Revolution ने लोगों को विश्वास दिलाया कि राजा एक अनुबंध के अंतर्गत प्रजा के प्रति उत्तरदायी है. यदि राजा अनुबंध को भंग करता है तो प्रजा का अधिकार है कि वह राजा को पदच्युत कर दे. यूरोप के अनेक देशों में निरंकुश राजतंत्र को समाप्त कर प्रजातंत्र की स्थापना की गयी.
रविवार, 10 सितंबर 2017
वेदों के विषय में संक्षिप्त विवरण – Vedas in Hindi
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On: सितंबर 10, 2017
वेद सनातन धर्म के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं. यहीं नहीं, ये विश्व के सबसे पुरानी कृतियाँ हैं. इन्हें संसार का आदिग्रंथ कहा जा सकता है. इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, मैं आपको बताना चाहूँगा कि वेद शब्द का अर्थ “ज्ञान” होता है. मूलतः वेद एक ही था. कालांतर में व्यास के द्वारा चार भागों में बाँटा गया. ये भाग अर्थात् संहिताएँ हैं – ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद (Rigveda, Samveda, Yajurveda and Atharvaveda – four vedas). इनके प्रधान विषय क्रमशः प्राथना-मन्त्र, ऋचा-गायन, यज्ञ-मन्त्र और औषधीय ज्ञान हैं. वेदों का काल निश्चित नहीं है. इन्हें अपौरुषेय बताया गया है अर्थात् ये मानव रचित नहीं हैं, ऐसा माना जाता है. परन्तु कई ऋचाओं के रचनाकार ऋषियों के नाम ऋचाओं में मिलते हैं. इनमें पुरुष और स्त्रियाँ दोनों सम्मिलित हैं. अतः वेदों के रचनाकार का निर्धारण एक कठिन कार्य है. कुछ लोग इन्हें ईशा के 6000 वर्ष पूर्व के मानते हैं और कुछ इनका रचनाकाल 1500 ई.पू. बतलाते हैं. प्रत्येक वेद के अपने-अपने ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् तथा उपवेद (Brahman, Aranyak, Upnishada and Upveda) हैं. इनका वर्णन नीचे द्रष्टव्य है –
ऋग्वेद (Rig Veda)
चार वेदों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन है. ऋग्वेद शब्द ऋक् (ऋचा अथवा मन्त्र) तथा वेद (विद् अर्थात् ज्ञान) से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है ज्ञान के सूक्त. ऋग्वेद (Rig veda)की संहिता (text) में 10 मंडल, 1028 सूक्त और 10, 580 ऋचाएँ हैं. ऋग्वेद के अनेक मन्त्र यज्ञ से सम्बंधित हैं परन्तु उसमें कुछ ऐसे मन्त्र भी मिलते हैं जिन्हें आदिकालीन धार्मिक कविता का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण कहा जा सकता है. ऋग्वेद (Rig veda) का रचनाकाल चाहे जो भी निर्धारित हो, इतना निश्चयपूर्ण कहा जा सकता है कि ऋग्वेद में भारतीय आर्यों के प्राचीनतम युग का इतिहास और उस युग की धार्मिक, सामजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक अवस्था का ज्ञान प्राप्त होता है.
i) ब्राह्मण – ऐतरेय ब्राह्मण और कौशीतकी ब्राह्मण
ii) आरण्यक – ऐतरेय आरण्यक, कौशीतकी
iii) उपनिषद् – ऐतरेय उपनिषद्
iv) उपवेद – आयुर्वेद
सामवेद (Samveda)
इस वेद में कुल 1549 ऋचाएँ हैं जिनमें से 75 को छोड़कर सभी ऋग्वेद संहिता (Rigved Samhita) से ली गई हैं. सामवेद (Samveda) की ऋचाओं का गान विविध वैदिक यज्ञों के अवसर पर होता था. सामवेद (Samveda) को संगीत-शास्त्र का आदि ग्रन्थ माना जाता है.
i) ब्राह्मण:- पंचविश ब्राह्मण, जैमिनीय ब्राह्मण और सद्विंश ब्राह्मण
ii) आरण्यक:- तवलकर, छान्दोग्य
iii) उपनिषद्:- छान्दोग्य, जैमिनीय और केन उपनिषद्
iv) उपवेद:- गन्धर्ववेद
यजुर्वेद (Yajurveda)
यजुर्वेद (Yajurveda) की दो शाखाएँ हैं – कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद. कृष्ण यजुर्वेद दक्षिण भारत और शुक्ल यजुर्वेद उत्तर भारत में प्रचलित है. यजुर्वेद (Yajurveda) में 18 काण्ड हैं. यजुर्वेद में 3988 मन्त्र हैं. गायत्री मन्त्र और महामृत्युंजय मन्त्र यजुर्वेद में ही हैं. यजुर्वेद (Yajurveda) का प्रधान विषय यज्ञ कार्य है.
i) ब्राह्मण – तैत्तिरीय ब्राह्मण
ii) आरण्यक – वृहदारण्यक, तैत्तिरीय और मैत्रायणी
iii) उपनिषद् – मुण्डक उपनिषद्, ईशावास्योपनिषद्, माण्डुक्य उपनिषद् और प्रश्न उपनिषद्
iv) उपवेद:- धनुर्वेद
अथर्ववेद (Atharva Veda )
अथर्वेद में 20 अध्याय और 5687 मन्त्र हैं. अथर्ववेद (Atharvaveda) के 8 खंड हैं. अथर्वेद गद्य-पद्य-मिश्रित है. इसमें औषाधियों, जादू-टोनों आदि विषय हैं. कुछ विद्वानों के अनुसार इस वेद के कई अंश ऋग्वेद (Rig veda) से प्राचीनतर हैं.
i) ब्राह्मण – गोपथ ब्राह्मण
ii) आरण्यक – इसका कोई स्वतंत्र आरण्यक नहीं है. यजुर्वेद के आरण्यक के कुछ अंश अथर्ववेद (Atharvaveda) के आरण्यक के रूप में जाने जाते हैं.
iii) उपनिषद् – इसका कोई स्वतंत्र उपनिषद् भी नहीं है. यजुर्वेद (Yajurveda) के उपनिषद् के कुछ अंश अथर्ववेद (Atharvaveda) के उपनिषद् के रूप में जाने जाते हैं.
iv) उपवेद:- स्थापत्यवेद
शनिवार, 9 सितंबर 2017
ऐसे सेनापति जिन्होंने एक भी जंग नही हारी।
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On: सितंबर 09, 2017
पेशवा बाजीराव प्रथम हिंदुस्तान में मराठा साम्राज्य का एक महान सेनापति था. उसने साल 1720 से लेकर अपनी मौत तक चौथे मराठा छत्रपति साहू के पेशवा (प्रधानमंत्री) के रूप में सेवा की. उन्होंने कभी एक जंग भी नहीं हारी अपने सैन्यकाल में. उनके शौर्य को सदैव जीवित रखने के लिए हम उसकी जीवनी आपको बताते हैं-
अपनी सेना को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया:
इतिहासकार बाजीराव पेशवा का पूरा नाम बाजीराव बल्लाल आयर थोराले बाजीराव भी बताते हैं. बाजीराव ने अपने सैन्य काल में मराठा साम्राज्य को चरम सीमा तक पहुंचाया था जो उसकी मौत के 20 साल बाद भी उसके पुत्र के शासन में बना रहा.
कभी एक जंग भी नहीं हारे पेशवा:
अपने 20 साल के छोटे सैन्यवृति में बाजीराव ने एक भी जंग नही हारी. एक अंग्रेज अफसर ने तो बाजीराव को हिंदुस्तान का सबसे बेहतरीन घुड़सवार सेना का सेनापति बताया है. वैसे बाजीराव मस्तानी फिल्म के जरिए बाजीराव के शौर्य के बारे में आपको काफी जानकारी मिली होगी.
जीवन परिचय:
बाजीराव का जन्म कोकनष्ठ चितपावन ब्राह्मण वंश के भट्ट परिवार में 18 अगस्त 1700 ईसवी को हुआ था. उसके पिता बालाजी विश्वनाथ, छत्रपति साहू के प्रथम पेशवा थे और मां का नाम राधाबाई था. बाजीराव के छोटे भाई का नाम चिमाजी अप्पा था. बाजीराव बचपन में ही अपने पिता के सैन्य अभियानों में उनके साथ जाते थे. जब साल 1720 में बाजीराव के पिता विश्वनाथ की मौत हो गई तब छत्रपति साहू ने 20 वर्षीय बाजीराव को पेशवा नियुक्त कर दिया. उसने हिन्दू साम्राज्य का भारत में प्रसार किया था.
मराठा साम्राज्य को पूरे देश में फैलाना चाहता था:
बाजीराव दिल्ली की दीवारों पर मराठा ध्वज लहराना चाहता था और मुगल साम्राज्य को समाप्त कर हिन्दू-पत-पदशाही साम्राज्य स्थापित करना चाहता था. कम उम्र में ही मिला पेशवा का पद मिलने के बाद निजामों के खिलाफ अभियान चलाया था. ऐसे ही और भी अभियान जैसे मालवा विजयी अभियान, बुंदेलखंड अभियान, गुजरात अभियान चलाया.
मात्र 39 साल की आयु में मृत्यु:
28 अप्रैल साल 1740 को अचानक बीमार हो जाने या शायद दिल का दौरा पड़ने से 39 वर्ष की उम्र में बाजीराव की मृत्यु हो गई. उस समय बाजीराव अपनी एक लाख सैनिकों की सेना के साथ इंदौर शहर के निकट खारगोन जिले में अपने कैंप में थे. बाजीराव का नर्मदा नदी के तट पर रावरखेड़ी नामक स्थान पर दाह संस्कार किया गया और इसी स्थान पर उनकी याद में एक छतरी का निर्माण भी किया गया.
अपनी सेना को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया:
इतिहासकार बाजीराव पेशवा का पूरा नाम बाजीराव बल्लाल आयर थोराले बाजीराव भी बताते हैं. बाजीराव ने अपने सैन्य काल में मराठा साम्राज्य को चरम सीमा तक पहुंचाया था जो उसकी मौत के 20 साल बाद भी उसके पुत्र के शासन में बना रहा.
कभी एक जंग भी नहीं हारे पेशवा:
अपने 20 साल के छोटे सैन्यवृति में बाजीराव ने एक भी जंग नही हारी. एक अंग्रेज अफसर ने तो बाजीराव को हिंदुस्तान का सबसे बेहतरीन घुड़सवार सेना का सेनापति बताया है. वैसे बाजीराव मस्तानी फिल्म के जरिए बाजीराव के शौर्य के बारे में आपको काफी जानकारी मिली होगी.
जीवन परिचय:
बाजीराव का जन्म कोकनष्ठ चितपावन ब्राह्मण वंश के भट्ट परिवार में 18 अगस्त 1700 ईसवी को हुआ था. उसके पिता बालाजी विश्वनाथ, छत्रपति साहू के प्रथम पेशवा थे और मां का नाम राधाबाई था. बाजीराव के छोटे भाई का नाम चिमाजी अप्पा था. बाजीराव बचपन में ही अपने पिता के सैन्य अभियानों में उनके साथ जाते थे. जब साल 1720 में बाजीराव के पिता विश्वनाथ की मौत हो गई तब छत्रपति साहू ने 20 वर्षीय बाजीराव को पेशवा नियुक्त कर दिया. उसने हिन्दू साम्राज्य का भारत में प्रसार किया था.
मराठा साम्राज्य को पूरे देश में फैलाना चाहता था:
बाजीराव दिल्ली की दीवारों पर मराठा ध्वज लहराना चाहता था और मुगल साम्राज्य को समाप्त कर हिन्दू-पत-पदशाही साम्राज्य स्थापित करना चाहता था. कम उम्र में ही मिला पेशवा का पद मिलने के बाद निजामों के खिलाफ अभियान चलाया था. ऐसे ही और भी अभियान जैसे मालवा विजयी अभियान, बुंदेलखंड अभियान, गुजरात अभियान चलाया.
मात्र 39 साल की आयु में मृत्यु:
28 अप्रैल साल 1740 को अचानक बीमार हो जाने या शायद दिल का दौरा पड़ने से 39 वर्ष की उम्र में बाजीराव की मृत्यु हो गई. उस समय बाजीराव अपनी एक लाख सैनिकों की सेना के साथ इंदौर शहर के निकट खारगोन जिले में अपने कैंप में थे. बाजीराव का नर्मदा नदी के तट पर रावरखेड़ी नामक स्थान पर दाह संस्कार किया गया और इसी स्थान पर उनकी याद में एक छतरी का निर्माण भी किया गया.
शुक्रवार, 8 सितंबर 2017
सम्राट अशोक के विषय में व्यापक जानकारी, कलिंग आक्रमण और शिलालेख
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On: सितंबर 08, 2017
अशोक (लगभग 273-232 ई.पू.) मौर्य वंश का तीसरा सम्राट था. मौर्य वंश के संस्थापक उसके पितामह चन्द्र गुप्त मौर्य (लगभग 322-298 ई.पू.) थे. चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद उसका पिता बिन्दुसार (लगभग 298 ई.पू.-273 ई.पू.) गद्दी पर बैठा था. सिंहली इतिहास में सुरक्षित जनश्रुतियों के अनुसार अशोक अपने पिता बिन्दुसार के अनेक पुत्रों में से एक था और जिस समय बिन्दुसार की मृत्यु हुई उस समय अशोक मालवा में उज्जैन में राजप्रतिनिधि था. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि राजपद के उत्तराधिकार के लिए भयंकर भ्रातृयुद्ध हुआ जिसमें उसके 99 भाई मारे गए और अशोक गद्दी पर बैठा. वैसे अशोक के शिलालेखों में इस भ्रातृयुद्ध का कोई संकेत नहीं मिलता है. इसके विपरीत शिलालेख संख्या 5 से प्रकट होता है कि अशोक अपने भाई-बहनों, परिवार के प्रति शुभचिंतक था. गद्दी पर बैठने के चार वर्ष बाद तक उसका राज्यभिषेक नहीं हुआ. इसे इस बात का प्रमाण माना जाता है कि उसको राजा बनाने के प्रश्न पर कुछ विरोध हुआ होगा.
अशोक सीरिया के राजा Antiochus II (261-246 ई.पू.) और कुछ अन्य यवन (यूनानी) राजाओं का समसामयिक था जिनका उल्लेख शिलालेख संख्या 8 में है. इससे पता चलता है कि अशोक ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में राज किया किन्तु उसके राज्याभिषेक की सही समय का पता नहीं चलता है. उसने 40 वर्ष राज्य किया. इसलिए शायद राज्याभिषेक के समय वह युवक ही रहा होगा.
अशोक का पूरा नाम अशोकवर्धन था. उसके लेखों में उसे सदैव “देवानामपिय” (देवताओं का प्रिय) और “पियदर्शिन्” (प्रियदर्शी) संबोधित किया गया है. केवल यास्की के लघु शिलालेख में उसको “देवानाम्-पिय अशोक” लिखा गया है.
कलिंग पर आक्रमण
अशोक के राज्यकाल के प्रारंभिक 12 वर्षों का कोई सुनिश्चित विवरण उपलब्ध नहीं है. इस काल में अपने पूर्ववर्ती राजाओं की तरह वह भी सामाजिक कार्यक्रमों, शिकार, मांस भोजन और यात्राओं में प्रवृत्त रहता था. किन्तु उसके राज्यकाल के 13वें वर्ष में उसके जीवन में एक बड़ा बदलाव आ गया. इस वर्ष राज्याभिषेक के आठ वर्ष बाद, उसने बंगाल की खाड़ी के तटवर्ती राज्य कलिंग पर आक्रमण किया. कलिंग राज्य उस समय महानदी और गोदावरी के बीच क्षेत्र में विस्तृत था. इस युद्ध के कारण का पता नहीं चलता है, लेकिन उसने कलिंग को विजय करके उसे अपने राज्य में मिला लिया. इस युद्ध में भयंकर रक्तपात हुआ. एक लाख व्यक्ति मारे गए और डेढ़ लाख बंदी बना लिए गए तथा कई लाख व्यक्ति युद्ध के आनेवाली अकाल, महामारी आदि विभीषिकाओं से नष्ट हो गए. अशोक को लाखों मनुष्यों के इस विनाश और उत्पीड़न से बहुत पश्चाताप हुआ और वह युद्ध से घृणा करने लगा. इसके बाद ही अशोक अपने शिलालेखों के अनुसार “धम्म” (धर्म) में प्रवृत्त हुआ. यहाँ धम्म का आशय बौद्ध धर्म लिया जाता है और वह शीघ्र ही बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया. बौद्ध मतावलंबी होने के बाद अशोक का व्यक्तित्व एक दम बदल गया.
आठवें शिलालेख में जो संभवतः कलिंग विजय के चार वर्ष बाद तैयार किया गया था, अशोक ने घोषणा की – “कलिंग देश में जितने आदमी मारे गए, मरे या कैद हुए उसके सौवें या हजारवें हिस्से का नाश भी अब देवताओं के प्रिय को बड़े दुःख का, कारण होगा”. उसने यह भी घोषणा की कि “(आप) विश्वास रखें कि जहाँ तक क्षमा का व्यवहार हो सकता हैं, वहां तक राजा हम लोगों के साथ क्षमा का बर्ताव करेगा.”
बौद्ध धर्म का रुख
कलिंग-विजय के बाद अशोक व्यक्तिगत रूप से बौद्ध मतावलंबी हो गया था. यह बात इससे सिद्ध होती है कि उसने अपने को यास्की के लघु शिलालेख संख्या 1 में बौद्ध-शाक्य बतलाया है और भाब्रू के शिलालेख में तीन रत्नों (बुद्ध, धर्म और संघ) में अपनी आस्था व्यक्त की है. सारनाथ के शिलालेख से स्पष्ट है कि उसने केवल बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्राएँ कीं और बौद्ध भिक्षु संघ की एकता बनाए रखने का प्रयत्न किया. इससे भी यही प्रकट होता है कि वह बौद्ध मतावलंबी था.
गुरु नानक देव जी मक्काजाने से जुड़ी कहानी।
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On: सितंबर 08, 2017
गुरु नानक जी के दो चेले थे एक का नाम था बाला और एक का नाम था मरदाना एक हिंदू और एक मुस्लिम। एक बार मरदाना ने गुरु जी से कहा कि मैं मक्का जाना चाहता हूं क्योंकि मुसलमान एक सच्चा मुसलमान तब तक नहीं कहलाता जब तक वह मक्का ना जाए । यह बात सुनकर गुरुजी उन्हें मक्का लेकर गए । मक्का पहुंचते-पहुंचते गुरूजी बहुत थक गए थे और वहां हाजियों के लिए बने आरामगाह में मक्का की तरफ पैर करके लेट गए।
आरामगाह में हाजियों की सेवा करने वाला खातिम जिसका नाम जियोन था वह यह देखकर बहुत गुस्सा हुआ और गुरु जी से बोला कि तुम कैसा आदमी है तुमको दिखता नहीं है कि वहां पर मक्का मदीना है और तुम उस तरफ पैर करके लेटे हो । तब गुरु जी बोले गुस्सा मत करो मैं बहुत थका हुआ हूं मुझे आराम चाहिए। मैं भी तुम्हारी तरह खुदा को मानता हूं तभी तो मैं यहां आया हूं मुझे नहीं पता कि खुदा का घर कहां है पर तुम्हें तो पता है तो तुम ही मेरे पांव उस तरफ कर दो।
परंतु जैसे ही वह गुरु जी का पांव दूसरी तरफ करता है मक्का भी उसी और चला जाता है। यह देखकर जीयोन को समझ आ जाता है कि यह शख्स कोई आम आदमी नहीं है खुदा का बंदा है और जीयोन तुरंत ही गुरु जी से माफी मांग लेता है। गुरुजी उसे कहते हैं ऐ खुदा के बंदे खुदा दिशाओं में वास नहीं करते वह तो दिलों में राज करते हैं। अच्छे कर्म करो और खुदा को दिल में रखो यही खुदा का सच्चा सदका है।
गुरुवार, 7 सितंबर 2017
श्रीलंका की 10 रोचक बाते आपको हैरान कर देगी
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On: सितंबर 07, 2017
श्रीलंका अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता है और यहां पर पर्यटकों का जमावाड़ा लगा रहता है. यहां घूमने के कई मशहूर ठिकाने हैं लेकिन यहां पर मौजूद कुछ खास जगहों का सौंदर्य देखकर आपकी आंखें खुली की खुली रह जाएंगी. लंका आज भी भारत के लिए हिंद महासागर में सर्वाधिक महत्वपूर्ण राष्ट्र है.श्रीलंका भारतीय इतिहास के सबसे प्राचीनतम ग्रंथों में शामिल रहा है. भगवान राम की श्रीलंका विजय को आज भी हर बच्चा जानता है.तो आज हम आपको श्रीलंका के कुछ ऐसे रहस्यों के बारे में बताने जा रहे है जो आपको मालूम नहीं है
श्रीलंका सन् 1972 तक सिलोन नाम से जाना जाता रहा. अब भी कई जगहों पर श्रीलंका को सिलोन नाम से ही जाना जाता है. सिलोन श्रीलंका की सदियों पुरानी पहचान है.
श्रीलंका की पहली राजधानी अनुराधापुरा थी. उस समय श्रीलंका अनुराधापुरा साम्राज्य के तौर पर जाना जाता था. भगवान बुद्ध की अनुराधापुरा यात्रा के बाद यहां बौद्ध धर्म का तेजी से प्रसार हुआ.
बाद में अनुराधापुरा की राजधानी पोलोन्नारुआ में स्थानांतरित कर दी गई. इसके 150 सालों बाद अनुराधापुरा 5 खंडों में अलग-अलग राज्यों के तौर पर विभाजित हो गया.
श्रीलंका में सबसे पहले पुर्तगालियों ने व्यापार प्रारंभ किया, तब कोलंबो व्यापार का मुख्य केंद्र हुआ करता था. बाद में श्रीलंका की राजधानी कैंडी स्थानांतरित कर दी गई. कैंडी श्रीलंका के बीचों-बीचो पहाड़ी पर बसा हुआ है.
श्रीलंका में सबसे ऊंचा स्थान पेड्रो की पहाड़ियां हैं. इस स्थान तक कोई भी नहीं पहुंच सकता, क्योंकि ये पहाड़ी सेना के कब्जे में है और आम लोगों को यहां पहुंचने की मनाही है.
श्रीलंका की दो आधिकारिक भाषाएं हैं. सिंहली और तमिल. यहां अर्धराष्ट्रपति प्रशासन के तहत राज होता है.
श्रीलंका के पास 13640 किलोमीटर लंबा समुद्री तट है. श्रीलंका चारो तरफ से समंदर से घिरा है. श्रीलंका सन 2004 में आई सुनामी से पूरी तरह से बर्बाद हो गया था.
श्रीलंका पूरी दुनिया में चाय का सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्यातक है। क्या आप जानते हैं कि चाय के बारे में दुनिया को 1867 में पता चला? चाय से पहले श्रीलंका अपनी कॉफी के लिए सुप्रसिद्ध था, लेकिन 1870 के दशक में कॉफी के बागानों के बर्बाद होने की वजह से कॉफी उद्योग बर्बाद हो गया.
श्रीलंका को आजादी सन् 1948 में मिली थी। भारत की आजादी के 1 साल बाद ही श्रीलंका ने ब्रिटेन से आजादी छीन ली थी. इसी साल आयरलैंड और इजरायल भी दुनिया के नक्शे पर आए थे.
श्रीलंका में करीब 20 हजार हाथी अब भी जिंदा बचे हैं. ये किसी भी देश के मुकाबले सर्वाधिक हैं. श्रीलंका में हाथियों के गोबर से कागज बनाया जाता है.
श्रीलंका सन् 1972 तक सिलोन नाम से जाना जाता रहा. अब भी कई जगहों पर श्रीलंका को सिलोन नाम से ही जाना जाता है. सिलोन श्रीलंका की सदियों पुरानी पहचान है.
श्रीलंका की पहली राजधानी अनुराधापुरा थी. उस समय श्रीलंका अनुराधापुरा साम्राज्य के तौर पर जाना जाता था. भगवान बुद्ध की अनुराधापुरा यात्रा के बाद यहां बौद्ध धर्म का तेजी से प्रसार हुआ.
बाद में अनुराधापुरा की राजधानी पोलोन्नारुआ में स्थानांतरित कर दी गई. इसके 150 सालों बाद अनुराधापुरा 5 खंडों में अलग-अलग राज्यों के तौर पर विभाजित हो गया.
श्रीलंका में सबसे पहले पुर्तगालियों ने व्यापार प्रारंभ किया, तब कोलंबो व्यापार का मुख्य केंद्र हुआ करता था. बाद में श्रीलंका की राजधानी कैंडी स्थानांतरित कर दी गई. कैंडी श्रीलंका के बीचों-बीचो पहाड़ी पर बसा हुआ है.
श्रीलंका में सबसे ऊंचा स्थान पेड्रो की पहाड़ियां हैं. इस स्थान तक कोई भी नहीं पहुंच सकता, क्योंकि ये पहाड़ी सेना के कब्जे में है और आम लोगों को यहां पहुंचने की मनाही है.
श्रीलंका की दो आधिकारिक भाषाएं हैं. सिंहली और तमिल. यहां अर्धराष्ट्रपति प्रशासन के तहत राज होता है.
श्रीलंका के पास 13640 किलोमीटर लंबा समुद्री तट है. श्रीलंका चारो तरफ से समंदर से घिरा है. श्रीलंका सन 2004 में आई सुनामी से पूरी तरह से बर्बाद हो गया था.
श्रीलंका पूरी दुनिया में चाय का सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्यातक है। क्या आप जानते हैं कि चाय के बारे में दुनिया को 1867 में पता चला? चाय से पहले श्रीलंका अपनी कॉफी के लिए सुप्रसिद्ध था, लेकिन 1870 के दशक में कॉफी के बागानों के बर्बाद होने की वजह से कॉफी उद्योग बर्बाद हो गया.
श्रीलंका को आजादी सन् 1948 में मिली थी। भारत की आजादी के 1 साल बाद ही श्रीलंका ने ब्रिटेन से आजादी छीन ली थी. इसी साल आयरलैंड और इजरायल भी दुनिया के नक्शे पर आए थे.
श्रीलंका में करीब 20 हजार हाथी अब भी जिंदा बचे हैं. ये किसी भी देश के मुकाबले सर्वाधिक हैं. श्रीलंका में हाथियों के गोबर से कागज बनाया जाता है.
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