पेशवा बाजीराव प्रथम हिंदुस्तान में मराठा साम्राज्य का एक महान सेनापति था. उसने साल 1720 से लेकर अपनी मौत तक चौथे मराठा छत्रपति साहू के पेशवा (प्रधानमंत्री) के रूप में सेवा की. उन्होंने कभी एक जंग भी नहीं हारी अपने सैन्यकाल में. उनके शौर्य को सदैव जीवित रखने के लिए हम उसकी जीवनी आपको बताते हैं-
अपनी सेना को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया:
इतिहासकार बाजीराव पेशवा का पूरा नाम बाजीराव बल्लाल आयर थोराले बाजीराव भी बताते हैं. बाजीराव ने अपने सैन्य काल में मराठा साम्राज्य को चरम सीमा तक पहुंचाया था जो उसकी मौत के 20 साल बाद भी उसके पुत्र के शासन में बना रहा.
कभी एक जंग भी नहीं हारे पेशवा:
अपने 20 साल के छोटे सैन्यवृति में बाजीराव ने एक भी जंग नही हारी. एक अंग्रेज अफसर ने तो बाजीराव को हिंदुस्तान का सबसे बेहतरीन घुड़सवार सेना का सेनापति बताया है. वैसे बाजीराव मस्तानी फिल्म के जरिए बाजीराव के शौर्य के बारे में आपको काफी जानकारी मिली होगी.
जीवन परिचय:
बाजीराव का जन्म कोकनष्ठ चितपावन ब्राह्मण वंश के भट्ट परिवार में 18 अगस्त 1700 ईसवी को हुआ था. उसके पिता बालाजी विश्वनाथ, छत्रपति साहू के प्रथम पेशवा थे और मां का नाम राधाबाई था. बाजीराव के छोटे भाई का नाम चिमाजी अप्पा था. बाजीराव बचपन में ही अपने पिता के सैन्य अभियानों में उनके साथ जाते थे. जब साल 1720 में बाजीराव के पिता विश्वनाथ की मौत हो गई तब छत्रपति साहू ने 20 वर्षीय बाजीराव को पेशवा नियुक्त कर दिया. उसने हिन्दू साम्राज्य का भारत में प्रसार किया था.
मराठा साम्राज्य को पूरे देश में फैलाना चाहता था:
बाजीराव दिल्ली की दीवारों पर मराठा ध्वज लहराना चाहता था और मुगल साम्राज्य को समाप्त कर हिन्दू-पत-पदशाही साम्राज्य स्थापित करना चाहता था. कम उम्र में ही मिला पेशवा का पद मिलने के बाद निजामों के खिलाफ अभियान चलाया था. ऐसे ही और भी अभियान जैसे मालवा विजयी अभियान, बुंदेलखंड अभियान, गुजरात अभियान चलाया.
मात्र 39 साल की आयु में मृत्यु:
28 अप्रैल साल 1740 को अचानक बीमार हो जाने या शायद दिल का दौरा पड़ने से 39 वर्ष की उम्र में बाजीराव की मृत्यु हो गई. उस समय बाजीराव अपनी एक लाख सैनिकों की सेना के साथ इंदौर शहर के निकट खारगोन जिले में अपने कैंप में थे. बाजीराव का नर्मदा नदी के तट पर रावरखेड़ी नामक स्थान पर दाह संस्कार किया गया और इसी स्थान पर उनकी याद में एक छतरी का निर्माण भी किया गया.
शनिवार, 9 सितंबर 2017
शुक्रवार, 8 सितंबर 2017
सम्राट अशोक के विषय में व्यापक जानकारी, कलिंग आक्रमण और शिलालेख
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On: सितंबर 08, 2017
अशोक (लगभग 273-232 ई.पू.) मौर्य वंश का तीसरा सम्राट था. मौर्य वंश के संस्थापक उसके पितामह चन्द्र गुप्त मौर्य (लगभग 322-298 ई.पू.) थे. चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद उसका पिता बिन्दुसार (लगभग 298 ई.पू.-273 ई.पू.) गद्दी पर बैठा था. सिंहली इतिहास में सुरक्षित जनश्रुतियों के अनुसार अशोक अपने पिता बिन्दुसार के अनेक पुत्रों में से एक था और जिस समय बिन्दुसार की मृत्यु हुई उस समय अशोक मालवा में उज्जैन में राजप्रतिनिधि था. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि राजपद के उत्तराधिकार के लिए भयंकर भ्रातृयुद्ध हुआ जिसमें उसके 99 भाई मारे गए और अशोक गद्दी पर बैठा. वैसे अशोक के शिलालेखों में इस भ्रातृयुद्ध का कोई संकेत नहीं मिलता है. इसके विपरीत शिलालेख संख्या 5 से प्रकट होता है कि अशोक अपने भाई-बहनों, परिवार के प्रति शुभचिंतक था. गद्दी पर बैठने के चार वर्ष बाद तक उसका राज्यभिषेक नहीं हुआ. इसे इस बात का प्रमाण माना जाता है कि उसको राजा बनाने के प्रश्न पर कुछ विरोध हुआ होगा.
अशोक सीरिया के राजा Antiochus II (261-246 ई.पू.) और कुछ अन्य यवन (यूनानी) राजाओं का समसामयिक था जिनका उल्लेख शिलालेख संख्या 8 में है. इससे पता चलता है कि अशोक ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में राज किया किन्तु उसके राज्याभिषेक की सही समय का पता नहीं चलता है. उसने 40 वर्ष राज्य किया. इसलिए शायद राज्याभिषेक के समय वह युवक ही रहा होगा.
अशोक का पूरा नाम अशोकवर्धन था. उसके लेखों में उसे सदैव “देवानामपिय” (देवताओं का प्रिय) और “पियदर्शिन्” (प्रियदर्शी) संबोधित किया गया है. केवल यास्की के लघु शिलालेख में उसको “देवानाम्-पिय अशोक” लिखा गया है.
कलिंग पर आक्रमण
अशोक के राज्यकाल के प्रारंभिक 12 वर्षों का कोई सुनिश्चित विवरण उपलब्ध नहीं है. इस काल में अपने पूर्ववर्ती राजाओं की तरह वह भी सामाजिक कार्यक्रमों, शिकार, मांस भोजन और यात्राओं में प्रवृत्त रहता था. किन्तु उसके राज्यकाल के 13वें वर्ष में उसके जीवन में एक बड़ा बदलाव आ गया. इस वर्ष राज्याभिषेक के आठ वर्ष बाद, उसने बंगाल की खाड़ी के तटवर्ती राज्य कलिंग पर आक्रमण किया. कलिंग राज्य उस समय महानदी और गोदावरी के बीच क्षेत्र में विस्तृत था. इस युद्ध के कारण का पता नहीं चलता है, लेकिन उसने कलिंग को विजय करके उसे अपने राज्य में मिला लिया. इस युद्ध में भयंकर रक्तपात हुआ. एक लाख व्यक्ति मारे गए और डेढ़ लाख बंदी बना लिए गए तथा कई लाख व्यक्ति युद्ध के आनेवाली अकाल, महामारी आदि विभीषिकाओं से नष्ट हो गए. अशोक को लाखों मनुष्यों के इस विनाश और उत्पीड़न से बहुत पश्चाताप हुआ और वह युद्ध से घृणा करने लगा. इसके बाद ही अशोक अपने शिलालेखों के अनुसार “धम्म” (धर्म) में प्रवृत्त हुआ. यहाँ धम्म का आशय बौद्ध धर्म लिया जाता है और वह शीघ्र ही बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया. बौद्ध मतावलंबी होने के बाद अशोक का व्यक्तित्व एक दम बदल गया.
आठवें शिलालेख में जो संभवतः कलिंग विजय के चार वर्ष बाद तैयार किया गया था, अशोक ने घोषणा की – “कलिंग देश में जितने आदमी मारे गए, मरे या कैद हुए उसके सौवें या हजारवें हिस्से का नाश भी अब देवताओं के प्रिय को बड़े दुःख का, कारण होगा”. उसने यह भी घोषणा की कि “(आप) विश्वास रखें कि जहाँ तक क्षमा का व्यवहार हो सकता हैं, वहां तक राजा हम लोगों के साथ क्षमा का बर्ताव करेगा.”
बौद्ध धर्म का रुख
कलिंग-विजय के बाद अशोक व्यक्तिगत रूप से बौद्ध मतावलंबी हो गया था. यह बात इससे सिद्ध होती है कि उसने अपने को यास्की के लघु शिलालेख संख्या 1 में बौद्ध-शाक्य बतलाया है और भाब्रू के शिलालेख में तीन रत्नों (बुद्ध, धर्म और संघ) में अपनी आस्था व्यक्त की है. सारनाथ के शिलालेख से स्पष्ट है कि उसने केवल बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्राएँ कीं और बौद्ध भिक्षु संघ की एकता बनाए रखने का प्रयत्न किया. इससे भी यही प्रकट होता है कि वह बौद्ध मतावलंबी था.
गुरु नानक देव जी मक्काजाने से जुड़ी कहानी।
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On: सितंबर 08, 2017
गुरु नानक जी के दो चेले थे एक का नाम था बाला और एक का नाम था मरदाना एक हिंदू और एक मुस्लिम। एक बार मरदाना ने गुरु जी से कहा कि मैं मक्का जाना चाहता हूं क्योंकि मुसलमान एक सच्चा मुसलमान तब तक नहीं कहलाता जब तक वह मक्का ना जाए । यह बात सुनकर गुरुजी उन्हें मक्का लेकर गए । मक्का पहुंचते-पहुंचते गुरूजी बहुत थक गए थे और वहां हाजियों के लिए बने आरामगाह में मक्का की तरफ पैर करके लेट गए।
आरामगाह में हाजियों की सेवा करने वाला खातिम जिसका नाम जियोन था वह यह देखकर बहुत गुस्सा हुआ और गुरु जी से बोला कि तुम कैसा आदमी है तुमको दिखता नहीं है कि वहां पर मक्का मदीना है और तुम उस तरफ पैर करके लेटे हो । तब गुरु जी बोले गुस्सा मत करो मैं बहुत थका हुआ हूं मुझे आराम चाहिए। मैं भी तुम्हारी तरह खुदा को मानता हूं तभी तो मैं यहां आया हूं मुझे नहीं पता कि खुदा का घर कहां है पर तुम्हें तो पता है तो तुम ही मेरे पांव उस तरफ कर दो।
परंतु जैसे ही वह गुरु जी का पांव दूसरी तरफ करता है मक्का भी उसी और चला जाता है। यह देखकर जीयोन को समझ आ जाता है कि यह शख्स कोई आम आदमी नहीं है खुदा का बंदा है और जीयोन तुरंत ही गुरु जी से माफी मांग लेता है। गुरुजी उसे कहते हैं ऐ खुदा के बंदे खुदा दिशाओं में वास नहीं करते वह तो दिलों में राज करते हैं। अच्छे कर्म करो और खुदा को दिल में रखो यही खुदा का सच्चा सदका है।
गुरुवार, 7 सितंबर 2017
श्रीलंका की 10 रोचक बाते आपको हैरान कर देगी
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On: सितंबर 07, 2017
श्रीलंका अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता है और यहां पर पर्यटकों का जमावाड़ा लगा रहता है. यहां घूमने के कई मशहूर ठिकाने हैं लेकिन यहां पर मौजूद कुछ खास जगहों का सौंदर्य देखकर आपकी आंखें खुली की खुली रह जाएंगी. लंका आज भी भारत के लिए हिंद महासागर में सर्वाधिक महत्वपूर्ण राष्ट्र है.श्रीलंका भारतीय इतिहास के सबसे प्राचीनतम ग्रंथों में शामिल रहा है. भगवान राम की श्रीलंका विजय को आज भी हर बच्चा जानता है.तो आज हम आपको श्रीलंका के कुछ ऐसे रहस्यों के बारे में बताने जा रहे है जो आपको मालूम नहीं है
श्रीलंका सन् 1972 तक सिलोन नाम से जाना जाता रहा. अब भी कई जगहों पर श्रीलंका को सिलोन नाम से ही जाना जाता है. सिलोन श्रीलंका की सदियों पुरानी पहचान है.
श्रीलंका की पहली राजधानी अनुराधापुरा थी. उस समय श्रीलंका अनुराधापुरा साम्राज्य के तौर पर जाना जाता था. भगवान बुद्ध की अनुराधापुरा यात्रा के बाद यहां बौद्ध धर्म का तेजी से प्रसार हुआ.
बाद में अनुराधापुरा की राजधानी पोलोन्नारुआ में स्थानांतरित कर दी गई. इसके 150 सालों बाद अनुराधापुरा 5 खंडों में अलग-अलग राज्यों के तौर पर विभाजित हो गया.
श्रीलंका में सबसे पहले पुर्तगालियों ने व्यापार प्रारंभ किया, तब कोलंबो व्यापार का मुख्य केंद्र हुआ करता था. बाद में श्रीलंका की राजधानी कैंडी स्थानांतरित कर दी गई. कैंडी श्रीलंका के बीचों-बीचो पहाड़ी पर बसा हुआ है.
श्रीलंका में सबसे ऊंचा स्थान पेड्रो की पहाड़ियां हैं. इस स्थान तक कोई भी नहीं पहुंच सकता, क्योंकि ये पहाड़ी सेना के कब्जे में है और आम लोगों को यहां पहुंचने की मनाही है.
श्रीलंका की दो आधिकारिक भाषाएं हैं. सिंहली और तमिल. यहां अर्धराष्ट्रपति प्रशासन के तहत राज होता है.
श्रीलंका के पास 13640 किलोमीटर लंबा समुद्री तट है. श्रीलंका चारो तरफ से समंदर से घिरा है. श्रीलंका सन 2004 में आई सुनामी से पूरी तरह से बर्बाद हो गया था.
श्रीलंका पूरी दुनिया में चाय का सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्यातक है। क्या आप जानते हैं कि चाय के बारे में दुनिया को 1867 में पता चला? चाय से पहले श्रीलंका अपनी कॉफी के लिए सुप्रसिद्ध था, लेकिन 1870 के दशक में कॉफी के बागानों के बर्बाद होने की वजह से कॉफी उद्योग बर्बाद हो गया.
श्रीलंका को आजादी सन् 1948 में मिली थी। भारत की आजादी के 1 साल बाद ही श्रीलंका ने ब्रिटेन से आजादी छीन ली थी. इसी साल आयरलैंड और इजरायल भी दुनिया के नक्शे पर आए थे.
श्रीलंका में करीब 20 हजार हाथी अब भी जिंदा बचे हैं. ये किसी भी देश के मुकाबले सर्वाधिक हैं. श्रीलंका में हाथियों के गोबर से कागज बनाया जाता है.
श्रीलंका सन् 1972 तक सिलोन नाम से जाना जाता रहा. अब भी कई जगहों पर श्रीलंका को सिलोन नाम से ही जाना जाता है. सिलोन श्रीलंका की सदियों पुरानी पहचान है.
श्रीलंका की पहली राजधानी अनुराधापुरा थी. उस समय श्रीलंका अनुराधापुरा साम्राज्य के तौर पर जाना जाता था. भगवान बुद्ध की अनुराधापुरा यात्रा के बाद यहां बौद्ध धर्म का तेजी से प्रसार हुआ.
बाद में अनुराधापुरा की राजधानी पोलोन्नारुआ में स्थानांतरित कर दी गई. इसके 150 सालों बाद अनुराधापुरा 5 खंडों में अलग-अलग राज्यों के तौर पर विभाजित हो गया.
श्रीलंका में सबसे पहले पुर्तगालियों ने व्यापार प्रारंभ किया, तब कोलंबो व्यापार का मुख्य केंद्र हुआ करता था. बाद में श्रीलंका की राजधानी कैंडी स्थानांतरित कर दी गई. कैंडी श्रीलंका के बीचों-बीचो पहाड़ी पर बसा हुआ है.
श्रीलंका में सबसे ऊंचा स्थान पेड्रो की पहाड़ियां हैं. इस स्थान तक कोई भी नहीं पहुंच सकता, क्योंकि ये पहाड़ी सेना के कब्जे में है और आम लोगों को यहां पहुंचने की मनाही है.
श्रीलंका की दो आधिकारिक भाषाएं हैं. सिंहली और तमिल. यहां अर्धराष्ट्रपति प्रशासन के तहत राज होता है.
श्रीलंका के पास 13640 किलोमीटर लंबा समुद्री तट है. श्रीलंका चारो तरफ से समंदर से घिरा है. श्रीलंका सन 2004 में आई सुनामी से पूरी तरह से बर्बाद हो गया था.
श्रीलंका पूरी दुनिया में चाय का सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्यातक है। क्या आप जानते हैं कि चाय के बारे में दुनिया को 1867 में पता चला? चाय से पहले श्रीलंका अपनी कॉफी के लिए सुप्रसिद्ध था, लेकिन 1870 के दशक में कॉफी के बागानों के बर्बाद होने की वजह से कॉफी उद्योग बर्बाद हो गया.
श्रीलंका को आजादी सन् 1948 में मिली थी। भारत की आजादी के 1 साल बाद ही श्रीलंका ने ब्रिटेन से आजादी छीन ली थी. इसी साल आयरलैंड और इजरायल भी दुनिया के नक्शे पर आए थे.
श्रीलंका में करीब 20 हजार हाथी अब भी जिंदा बचे हैं. ये किसी भी देश के मुकाबले सर्वाधिक हैं. श्रीलंका में हाथियों के गोबर से कागज बनाया जाता है.
बुधवार, 6 सितंबर 2017
विश्वामित्र ने कैसे पाई ब्रह्मर्षि का उपाधि
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On: सितंबर 06, 2017
विश्वामित्र ने ऋषि, महर्षि और उसके बाद राजर्षि तक की उपाधि पा ली थी मगर कोई उन्हें ब्रह्मर्षि का दर्जा नहीं दे रहा था। जब भी कहीं ऐसी कोई चर्चा चलती, उन्हें यही सुनने को मिलता कि ब्रह्मर्षि तो वशिष्ठ हैं। उन्होंने और कठिन तपस्या शुरू की। कहते हैं कि उनके तप के प्रभाव से दिग-दिगंत कांप उठे, पर लंबी तपस्या का भी वैसा कोई फल नहीं मिला जैसा विश्वामित्र चाहते थे। आखिर उनका धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने तपस्या छोड़ी और चल पड़े वशिष्ठ के आश्रम की ओर कि आज नहीं छोड़ूंगा उसे।
उन्हें लग रहा था कि जरूर वशिष्ठ की इसमें कोई चाल है, वर्ना ऐसा क्या कि उनके अलावा दूसरा कोई ब्रह्मर्षि न बन सके।
यही सब सोचते हुए विश्वामित्र वशिष्ठ के आश्रम तक पहुंच गए। उन्होंने देखा कि चांदनी रात में वशिष्ठ बैठे अपने शिष्यों के साथ बातचीत कर रहे हैं। वहीं पास की झाड़ी में छिप कर वह गुरु और शिष्यों के बीच की बातचीत सुनने लगे। शिष्य ने वशिष्ठ से पूछा, ‘‘गुरुवर स्वच्छ आकाश में प्रकाश फैला रहे इस शीतल चांद को देख कर आपके मन में कौन से भाव आ रहे हैं।’’
वशिष्ठ बोले, ‘‘चांद की चांदनी वैसे ही पूरे संसार को प्रकाशित कर रही है जैसे ऋषि विश्वामित्र का यश।’’ विश्वामित्र चकित रह गए। कहां तो मैं इन्हें मारने चला था और कहां यह मेरी प्रशंसा कर रहे हैं। वह सामने आए और सीधे वशिष्ठ के चरणों पर गिर पड़े, ‘‘क्षमा ऋषि प्रवर, क्षमा।’’
वशिष्ठ ने उन्हें उठाते हुए कहा, ‘‘उठो ब्रह्मर्षि।’’ इस बार विश्वामित्र समेत समस्त शिष्टमंडली चौंक पड़ी, पर वशिष्ठ मुस्कुराते खड़े थे। उन्होंने कहा, ‘‘विश्वामित्र हर तरह से योग्य थे, बस उनका अहं और इस पद की लालसा उनके मार्ग की बाधा थी। जैसे ही वह पश्चाताप के आंसुओं के साथ झुके, दोनों बाधाएं तत्क्षण दूर हो गईं और वह पद उन्हें मिल गया जिसके वह अधिकारी थे।’’
मंगलवार, 5 सितंबर 2017
भीम ने क्यो बनाया था एक रात में बांध,
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On: सितंबर 05, 2017
मध्य प्रदेश हमेशा से संस्कृति और स्थापत्य कलाओं को लेकर दुनियाभर में फेमस है। इसकी पहाडिय़ों और कंदराओं में ढेरों अनसुलझे रहस्य भी दबे पड़े हैं, जिनको ना तो सुलझाया जा सका और ना ही कोई हल ही निकल पाया है।
ऐसे ही एक अनसुलझे सवालों के लिए भोपाल से करीब 180 किमी दूर स्थित देवास का कावडिय़ा पहाड़ आज भी चर्चा और आश्चर्य का विषय बना हुआ है। लंबे और षठकोणीय पत्थरों से बने पहाड़़ को लेकर यह चर्चा है कि यह मानव निर्मित है या प्रकृति ने इसे नायाब रूप दिया है।
बीयू से पीएचडी कर चुके डॉ रत्नेश का कहना है कि मैं रिसर्च के लिए देवास और आस-पास के इलाकों में लंबे समय तक रहा हूं। इस पहाड़ के बारे में एक दंतकथा प्रचलित है कि, एक बार मां नर्मदा और भीम के बीच संवाद हुआ, जिसमें मां नर्मदा ने शर्त रखी कि अगर तुम एक रात में बांध बनाकर मेरे पानी को रोक दोगे तो मैं तुमसे शादी कर लूंगी।
मां नर्मदा की शर्त मानते हुए भीम ने पत्थरों का पहाड़ तो बना दिया लेकिन मां नर्मदा के पानी को रोक नहीं पाए। तब से यह पहाड़ एक बांध के रूप में स्थापित हो गया।
कावडिय़ा पहाड़ पर लंबे समय से रिसर्च कर रहे इतिहासविद डॉ तेज सिंह सेंधव के अनुसार यह पहाड़ महाभारत काल में बना हुआ है। उन्होंने अपनी पुस्तक युग-युगीन देवास में इसके भीम द्वारा निर्मित होने के साक्ष्य भी दिए हैं।
इतिहास के संरक्षण के लिए काम कर रही है एक संस्था अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नई दिल्ली ने भी सेंधव के इस तथ्य को सही ठहराया है। वहीं आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया एएसआई इसे वातावरण में आए बदलाव का रूप मानते हैं।
डॉ सिंह का कहना है कि मैं इस पहाड़ पर लंबे समय से रिसर्च कर रहा हूं। साथ ही देश भर के कई रिसर्च स्कॉलर भी इस पर शोध कर रहे हैं, जो इन दिनों भोपाल में हैं। हमने इस पहाड़ को लेकर कार्बन डेटिंग कराई है।
इसका समय महाभारत काल से जुड़ा है। इसलिए यह उसी काल की निर्मित पहाड़ी है। देवास और आस-पास के इलाकों में पांडवों के आने के भी साक्ष्य मिलते हैं। जो इस बात को और भी पुष्ट करते हैं कि पहाड़ महाभारत काल में निर्मित है।
सीनियर आर्कियोलॉजिस्ट पूजा सक्सेना कहती हैं, यह कयास गलत है कि इसका निर्माण भीम ने किया है। बल्कि ऐसे पहाड़ों का निर्माण ज्वालामुखी के फटने और लंबे समय बाद ठंडा होने के परिणामस्वरूप बनता है। दुनिया में ऐसे कई द्वीप हैं, जहां ऐसे पहाड़ बडी संख्या में देखने को मिलते हैं।
ऐसे ही एक अनसुलझे सवालों के लिए भोपाल से करीब 180 किमी दूर स्थित देवास का कावडिय़ा पहाड़ आज भी चर्चा और आश्चर्य का विषय बना हुआ है। लंबे और षठकोणीय पत्थरों से बने पहाड़़ को लेकर यह चर्चा है कि यह मानव निर्मित है या प्रकृति ने इसे नायाब रूप दिया है।
बीयू से पीएचडी कर चुके डॉ रत्नेश का कहना है कि मैं रिसर्च के लिए देवास और आस-पास के इलाकों में लंबे समय तक रहा हूं। इस पहाड़ के बारे में एक दंतकथा प्रचलित है कि, एक बार मां नर्मदा और भीम के बीच संवाद हुआ, जिसमें मां नर्मदा ने शर्त रखी कि अगर तुम एक रात में बांध बनाकर मेरे पानी को रोक दोगे तो मैं तुमसे शादी कर लूंगी।
मां नर्मदा की शर्त मानते हुए भीम ने पत्थरों का पहाड़ तो बना दिया लेकिन मां नर्मदा के पानी को रोक नहीं पाए। तब से यह पहाड़ एक बांध के रूप में स्थापित हो गया।
कावडिय़ा पहाड़ पर लंबे समय से रिसर्च कर रहे इतिहासविद डॉ तेज सिंह सेंधव के अनुसार यह पहाड़ महाभारत काल में बना हुआ है। उन्होंने अपनी पुस्तक युग-युगीन देवास में इसके भीम द्वारा निर्मित होने के साक्ष्य भी दिए हैं।
इतिहास के संरक्षण के लिए काम कर रही है एक संस्था अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नई दिल्ली ने भी सेंधव के इस तथ्य को सही ठहराया है। वहीं आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया एएसआई इसे वातावरण में आए बदलाव का रूप मानते हैं।
डॉ सिंह का कहना है कि मैं इस पहाड़ पर लंबे समय से रिसर्च कर रहा हूं। साथ ही देश भर के कई रिसर्च स्कॉलर भी इस पर शोध कर रहे हैं, जो इन दिनों भोपाल में हैं। हमने इस पहाड़ को लेकर कार्बन डेटिंग कराई है।
इसका समय महाभारत काल से जुड़ा है। इसलिए यह उसी काल की निर्मित पहाड़ी है। देवास और आस-पास के इलाकों में पांडवों के आने के भी साक्ष्य मिलते हैं। जो इस बात को और भी पुष्ट करते हैं कि पहाड़ महाभारत काल में निर्मित है।
सीनियर आर्कियोलॉजिस्ट पूजा सक्सेना कहती हैं, यह कयास गलत है कि इसका निर्माण भीम ने किया है। बल्कि ऐसे पहाड़ों का निर्माण ज्वालामुखी के फटने और लंबे समय बाद ठंडा होने के परिणामस्वरूप बनता है। दुनिया में ऐसे कई द्वीप हैं, जहां ऐसे पहाड़ बडी संख्या में देखने को मिलते हैं।
सोमवार, 4 सितंबर 2017
भारत मे बहाई धर्म की कहानी।
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On: सितंबर 04, 2017
बहाई धर्म उन्नीसवीं सदी के ईरान में सन 1844 में स्थापित एक नया धर्म था, जो एकेश्वरवाद और विश्वभर के विभिन्न धर्मों और पंथों की एकमात्र आधारशिला पर जोर देता है. इस धर्म की स्थापना बहाउल्लाह ने की थी और इसके मतों के मुताबिक दुनिया के सभी मानव धर्मों का एक ही मूल है.
इसके अनुसार कई लोगों ने ईश्वर का संदेश इंसानों तक पहुंचाने के लिए नए धर्मों का प्रतिपादन किया जो उस समय और परिवेश के लिए उपयुक्त है।
तो आइए जानते हैं बहाई धर्म के बारे में 8 रोचक तथ्य…
1. बहाई धर्म के अनुयायी बहाउल्लाह को पूर्व के अवतारों कृष्ण, ईसा मसीह, मुहम्मद, बुद्ध, जरथुस्त्र, मूसा आदि का पुर्नजन्म माना जाता है. इस धर्म के लोग बहाउल्लाह को कल्कि अवतार के रूप में भी मानते हैं.
2. बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह का जन्म आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व तेहरान (ईरान) में हुआ था. बहाउल्लाह का शाब्दिक अर्थ है – ‘ईश्वरीय प्रकाश’ या ‘परमात्मा का प्रताप’.
Image: Bahai Rants
3. बहाउल्लाह को प्रभु का कार्य करने के कारण तत्कालिक शासक के आदेश से 40 वर्षों तक जेल में असहनीय कष्ट सहने पड़े. जेल में उनके गले में लोहे की मोटी जंजीर डाली गई तथा उन्हें कई तरह की कठोर यातनायें दी गई.
भारत में बहाई धर्म कैसे आया ?
4. भारत में बहाई धर्म से इसके स्थापना वर्ष 1844 से ही जुड़ा हुआ है. असल में जिन 18 पवित्र आत्माओं ने ‘महात्मा बाब’, ‘भगवान बहाउल्लाह’ के अग्रदूत को पहचाना और स्वीकार किया था, उन में से एक व्यक्ति भारत के रहने वाले थे और इस तरह से ये धर्म भारत आया.
5. ‘बहाउल्लाह’ ने लोगों को यह संदेश दिया कि सम्पूर्ण मानव एक जाति है और वह समय आ गया है, जब वह एक वैश्विक समाज में बदल जाये.
6. बहाउल्लाह द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘किताब-ए-अकदस’ में इसके सिद्धांतों का विवरण मिलता है. यह किताब 1873 के आसपास लिखी गई थी. इस किताब को इसके फारसी नाम ‘किताब-ए-अकदस’ से अधिक जाना जाता है.
7. बहाई धर्म के अनुयायी पूरी दुनिया के लगभग 180 देशों में समाज-नवनिर्माण के कामों में लगे हुए हैं. बहाई धर्म में धर्म गुरु, पुजारी, मौलवी या पादरी वर्ग नहीं होता है.
8. ‘बहाई उपासना मन्दिर’ जोकि ‘लोटस टेम्पल’ के नाम से जाना जाता है, कालका जी, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली में स्थित है. बहाई धर्म के पूरी दुनिया में कुल 7 देशों में मन्दिर बनाये गये हैं जो कि वेस्टर्न समोआ, सिडनी – औस्ट्रेलिया, कम्पाला- युगान्डा, पनामा सिटी – पनामा, फ्रेन्क्फर्ट्- जर्मनी और विलमेट, अमेरिका और नई दिल्ली, भारत में मौजूद हैं.
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